words per minute
7
MotivatioNAddA
00:00
Speed
विश्व भर के युवाओं के पथ प्रदर्शक और पूरी दुनिया में भारतीय संस्कृति की पताका फहराने वाले स्वामी विवेकानंद का प्रयाग से गहरा नाता रहा है। उन्होंने माघ मेला के दौरान संगम की रेती पर न केवल गहरी साधना की थी बल्कि वैदिक दर्शक की प्राप्ति भी उन्हें यहीं से हुई थी। इलाहाबाद प्रवास के दौरान ही रामकृष्ण मठ की स्थापना को लेकर उन्होंने सपना देखा था, जिसे बाद में उनके गुरु भाई ने साकार किया था। यूं तो स्वामी विवेकानंद का प्रयाग आगमन केवल आध्यात्मिक साधना का एक अवसर माना जाता रहा है लेकिन इस प्रवास का मुख्य कारक उन्होंने अपनी आत्मकथा में स्पष्ट किया था। 31 दिसंबर 1889 को स्वामी अपने बीमार गुरु भाई स्वामी योगानंद को देखने आए थे। प्रयाग की माटी ने उनका मन इस कदर मोहा कि उन्होंने तब चल रहे माघ मेला का पूरा लाभ उठाया। ध्यान और साधना के लिए संगम की रेती को चुना था। प्रयाग में ही सनातन धर्म और परंपरा का अध्ययन संतों के सानिध्य में रहकर किया था। वैदिक दर्शन की खोज और प्राप्ति के बाद यहां के युवाओं को खासकर प्रेरित किया था। यहां के धर्म और आध्यात्म की छाप विवेकानंद पर ऐसे पड़ी कि ने यहीं से रामकृष्ण मिशन स्थापना की विचारधारा का प्रचार-प्रसार शुरू किया था। बाद में रामकृष्ण मिशन के पांच केंद्रों की जब स्थापना हुई अथवा की गई तो उसमें एक इलाहाबाद भी रहा है। महोदय आजकल एवं कुछ शताब्दियों से भारतवर्ष की जनता के बीच इलाहाबाद शहर का नाम बड़ी श्रद्धा व लगन के साथ लिया जाता है। इसका कारण यह है कि वहां पर तीर्थराज संगम की महत्ता। इलाहाबाद शहर का नामकरण पहले प्रयाग था जो कि मुगल शासन के दौरान इसका नामकरण अल्लाहाबाद रखा गया, यही नाम कालान्तर में आगे चलकर इलाहाबाद के नाम से प्रसिद्ध हुआ।