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AvinashSingh7166
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इन दिनों उत्तर प्रदेश भारत के कुछ इलाकों को पसरा खतरनाक स्मॉग ही चर्चा केंद्र में है। सियासी घमासान में किसानों द्वारा परली (फसल का अवशेष) जलाने का मुद्दा भी छाया हुआ है, मगर अफसोस कि इस पर हंगामे और तल्ख बयानबाजी के बीच इससे जुडे असल मुद्दों की अनदेखी की जा रही है। स्मॉग की वजह से बदतर होते हालात के लिए परली जलाने को ही कसूरवार भले ही ठहराया जा रहा हो, लेकिन कोई इस पर बात करने के लिए भी तैयार नहीं कि असल में यह मसला केवल पराली जलाने या ऐसा करने पर किसानों को सजा देने तक ही नहीं सिमटा हुआ है। यह तो समस्या का सरलीकरण करना ही हुआ। वास्तव में यह बहुत ही व्यापाक मुद्दा है जिसके आर्थिक एवं सामाजिक पहलुओं के समग्र संदर्भ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह ऐसा मसला है जिसकी परिधि केवल न्यायिक सीमा तक ही नहीं है, बल्कि इसके सामाजिक और आर्थिक पहलू भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इससे जुड़े कानूनी समाधान में मीनमेख निकालने की मेरी कोई मंशा नहीं है। अगर स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाए तो न्यायिक तंत्र को सक्रिय होना ही पड़ेगा हमने भी पंजाब में पराली जलाने के कई मामलों में कार्रवाई की है। यहां तक कि मुझे अपनी भावनाओं के खिलाफ जाकर यह कदम उठाना पड़ा, क्योंकि मैं उन किसानों को कभी दंडित नहीं करना चाहता जो पहले से ही कर्ज के बोझ तले कराहते हुए अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। लिहाजा मेरी यही मानना है कि जब हम सभी उपलब्ध विकल्प आजमाकर भी सफल न हो पाएं तभी अंतिम समाधान के तौर न्यायिक विकल्प का सहारा लिया जाना चाहिए। क्या हमने अभी तक अन्य सभी विकल्प आजमा लिए। क्या हमने किसानों को कारगर विकल्प सुझाए जिन्हें अपनाने में वे नाकाम रहे कि अब उन्हें दंडित करना आवश्यक है?
अफसोस कि इन सभी सवालों का जवाब है-नहीं। चूंकि समस्या के दीर्घकालिक समाधान के लिए किसी भी सार्थक पहल पर कोई चर्चा ही नहीं हुई इसलिए समस्या साल दर साल और विकराल होती जा रही है। अभी बस यही हो रहा है कि किसानों को ही कसूरवार मानकर उन पर सख्त नियंत्रण और निगरानी की मांग हो रही है। पराली जलाने के लिए जिम्मेदार कारणों पर विचार न करने के साथ लोग यह भी नहीं सोचते कि किसी व्यावहारिक विकल्प के अभाव में यह किसानों की अाजीविका से जुड़ा मसला है। अन्य कृषि प्रधान राज्यों की तरह पंजाब के लिए भी किसानों की आत्महत्या एक गंभीर और संवेदनशील मुद्दा रहा है। ऐसे में और परेशानियां बढ़ने से किसानों की स्थिति बद से बदतर होती जाएगी। इन हालात में पंजाब का रुख यही है कि सरकार पराली जलाए जाने की निरंतर निगरानी करेगी।