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AviGupta
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भ्रष्टाचार शब्द से तात्पर्य सरकारी क्षेत्र के निर्णय से है। अगर निजी क्षेत्र की कंपनियों क निर्णयों को इसमें शामिल करते हैं। तो यह गलत है। निजी क्षेत्र के उपक्रम सक्षम हैं क्योंकि वे अपने कर्मचारियों को निर्णय लेने की शक्ति दे सकते हैं। यह अधिकार पिछले अनुभव, संदर्भ और विश्वास जैसी बातों पर आधारित होता है। अगर हम निजी क्षेत्र के उपक्रमों को भी सरकारी की तरह व्यवहार करने को विवश करेंगे तो हमारी आर्थिक गतिशीलता प्रभावित होगी। निजी क्षेत्र में शुचिता पैदा करने वाली जांच परख को मजबूत करने की आवश्यकता है लेकिन जिन नीतिगत सुधारों की जरूरत है उनका सरकारी क्षेत्र की भ्रष्टाचार निरोधक मशीनरी से कोई वास्ता नहीं है।
भ्रष्टाचार शब्द का तात्पर्य किसी राजनेता या नौकरशाह को प्रभावित करने वाले व्यक्तिगत लाभ से है। सार्वजनिक जीवन व्यवस्था में भ्रष्टाचार कम करने के लिए जरूरी है कि विवेकाधीन अधिकार कम किए जाएं, पारदर्शिता में इजाफा किया जाए, औपचारिक क्रय प्रक्रिया का निर्धारण हो तथा अन्य उपाए किए जाएं। सबसे आखिर में आती है भ्रष्टाचार निरोधक मशीनरी जिसमें भ्रष्टाचार निरोधक कानून (पोका) भी शामिल है। भारत में कई लोग अब इस मशीनरी को निजी क्षेत्र में ले जाना चाहते हैं।
निली उपक्रमों में निर्णय प्रक्रिया सरकारी क्षेत्र से एकदम अलग होती है। यहाँ उच्च स्तर की अनौपचारिकता निर्णय प्रक्रिया की पहचान है। जो कारक मायने रखते हैं उनमें मित्रों की राय और उनके अनुभव, अतीत के अनुभव और भरोसा आदि शामिल हैं। हर तरह के अनुबंध अधूरे होते हैं और निजी क्षेत्र में भरोसेमंद पक्षकारों से हमेशा यह अपेक्षा की जाती है कि वे निरंतर बातचीत करते रहेंगे और अनुबंध की शर्तों को जरूरत के मुताबिक बदलते रहेंगे।