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गत सप्ताह लोकसभा को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया। इससे पहले देश की संसद 18 वर्ष में सबसे कमजोर बजट सत्र की साक्षी बनी। सत्र के दूसरे हिस्से में लोकसभा अपनी तय मियाद के बमुश्किल 4 फीसदी समय तक ही संचालित हो सकी। राज्य सभा अपने निर्धारित समय के 10 फीसदी के बराबर काम कर सकी। किसी भी वर्ष में सबसे नियमित विधान का सबसे महत्वपूर्ण भाग होता है वित्त विधेयक। इस वर्ष यह विधेयक केवल 18 मिनट में पारित हो गया। इसे लेकर जरा सी भी चर्चा नहीं हुई। दूसरे शब्दों में कहें तो 99 केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों तथा 200 से अधिक संशोधनों को लेकर कोई संसदीय चर्चा नहीं की गई। लोकसभा अध्यक्ष ने गिलोटिन (अनुदान और मांग पर चर्चा का समय समाप्त होने के बाद एक बरगी मतदान)कीमदद से एक झटके में बहस का अंत कर दिया। इसके परिणामस्वरूप वित्त विधेयक में कई महत्वपूर्ण बदलाव जनता के सामने ही नहीं आ सके। उदाहरण के लिए सांसदों के वेतन में तेज इजाफा, उनके दैनिक भत्ते और पेंशन में बढ़ो पर चर्चा होनी चाहिए थी। इससेे भी बुरी बा यह थी कि वित्त विधेयक में विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम (एफसीआर) की एक धारा को अतीत की तिथि से समाप्त कर दिया गया। ऐसा करके बीते 42 सालों में भारतीय राजनीतिक दलों को हुई तमाम विदेशी फंडिंग को कानूनी रूप दे दिया गया। इसकी अधिक गहन सार्वजनिक पड़ताल की आवश्यकता थी।
जो लोग ससद में विरोध प्रदर्शन करते हैं। जबावदेही तो उनकी भी बनती है। उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश के सदस्य जो अपने राज्य के लिए विशेष दर्जा चाहते हैं। परंतु प्राथमिक जबावदेही सरकार के प्रबंधकों और दोनों सदनों की आसंदी पर बैठे लोगों की होनी चाहिए। इसमें दोराय नहीं है कि सरकार ने अपने प्रस्तावों पर किसी भी तरह की बहस को कम रखने का प्रयत्न किया। उदाहरण के लिए आधार अधिनियम जैसे दूरगामी प्रभाव वाले कानूनों की पूरी श्रृंखला को धन विधेयक के रूप में प्रस्तुत यिका गया, यानी उन्हें बिना राज्य सभा के बहुतम के पारित किया जा सकता था। इन विधेयकों पर भी सदन में चर्चा तक नहीं की जा सकी क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष ने गिलोटिन का इस्तेमाल किया और माना गया कि राज्य सभा ने उनको सदन पटल पर रखे बिना लौटा दिया। यह संसद की संवैधानिक कार्यप्रणाली का उल्लंघन है। गिलोटिन का लक्ष्य है यह सुनिश्चित करना कि लंबी बहस के चलते सरकार के पास वित्त की कमी न हो जाए। यह धन विधेकय या अन्य कानूनों पर चर्चा को रोकने का औजार नहीं हैं। बीते कुछ साल में संसद के कामकाज का स्तर इतना गिरा है कि उसमें और निहायत कमजोर अंदालज में चलने वाली राज्य विधानसभाओं में कोई अंतर ही नहीं बचा।