words per minute
5
laxmisahu
00:00
Speed
तो ये हैं भारतीय खेलों की असली कहानी, जो राष्ट्रमंडल खेलों में देश को स्वर्ण पदक दिलाने वाली पूनम यादव ने सुनाई। पूनम को भारोत्तोलम की तैयारी कराने के लिए उनके पिता को अपनी भैंस बेचनी पड़ गई। पिछले राष्ट्रमंडल खेलों में पूनम कांस्य पदक जीता तो मिठाई खिलाने के लिए पैसे उसके पास नहीं थे। कई बार ट्रेनिंग के दौरान पूनम को भूखे सोना पड़ा। वहीं दूसरी तरफ खेलों के विकास के नाम पर देश और राज्यों की सरकारें अरबों-खरबों रुपये खर्च करती है। प्रतिभाओं की खोज के नाम कई योजनाएं चल रही है। अनेक औद्योगिक घराने खेलों को बढ़ावा देने के नाम पर करोड़ों रुपये बहा रहे हैं। पूनम की व्यथा सुनकर सवाल उठता है कि आखिर ये पैसा जा कहा रहा है? पैसा खिलाड़ियों की प्रतिभा तरासने पर खर्च हो रहा है अथवा अधिकारियों के विदेशी सैर-सपाटों पर।
हर क्षेत्र में आज भारत का लोहा दुनिया मान रही है। भारत ने दुनिया को अच्छे विज्ञानिक दिये हैं। दुनिया भर के अस्पतालों में भारतीय डॉक्टर बेहतर काम कर रहे हैं। अंतरिक्ष के क्षेत्र में भी हमारी उपलब्धियां भी गर्भ करने लायक है। रक्षा क्षेत्र में भी हमने पैरों पर खड़ा होने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन चंद खेलों को तौड़ दिया जाये तो हमारी उपलब्धियां अंगुलियों पर गिनने लायक हैं। ओलंम्पिक खेलों में आज तक बटे पांच हजार से अधिक स्वर्ण पदकों में से हमारे खाते में कुल नौ ही दर्ज है। कुल 15 हजार पदकों में से अब तक हम सिर्फ 28 पदक ही बटौर पाये है। हम से बहुत छोटे-छोटे देश जीतने का शतक लगा चुके हैं। पूनम की कहानी शायद हमारे तमाम सवालों का जवाब देने के लिए पर्याप्त है। गांव में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, जरूरत उन्हें तरासने की है। पूनम जैसी कितनी ही लड़कियां होंगी जो खेलने का जुनून रखती होगी। पूनम के पिता जैसे कितने पिता होंगे जो अपने बच्ची को खेलता देखने के लिए भैंस बेच दें।