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laxmisahu
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एसोसिशन फाॅर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) जैसी संस्था का धन्यवाद। देश की सवा सौ करोड़ जनता की आंखें खोलने के लिए। ये बताने के लिए कि हमारे देश के राजनीतिक दल चंदा उगाह कर किस तरह कमाई के मामले में औद्योगिक घरानों को चुनौती दे रहे हैं। एडीआर की ताजा रिपोर्ट से सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को मिले राजनीतिक चंदे का खुलासा हुआ है। एक साल में भाजपा की 'कमाई' 81 फीसदी बढ़ गई। पिछले साल 570 करोड़ रुपए के मुकाबलले इस साल 1034 करोड़ रुपए कमाए। रिपोर्ट ये भी बताती है कि देश पर सबसे अधिक समय तक शासन करने वाली कांग्रेस की कमाई 14 फीसदी कम हो गई है। खास बात ये कि भाजपा ने चंदे की कमाई में से खर्चे के बाद 325 करोड़ रुपए बचा भी लिए। राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे का दो-तिहाई अकेले भाजपा के खाते में गया। यहां ये महत्वपूर्ण नहीं कि भाजपा को ही सर्वोधिक चंदा क्यों मिला। सबको पता है कि औद्योगिक घराने और दूसरे बड़े व्यापारी सत्तारूढ़ दल को अधिक चंदा देते हैा। महत्वपूर्ण यह है कि करोड़ों का चंदा देने वाले लोग अपने 'निवेश' की वसूली कैसे करते हैं। औद्योगिक घराने इसे चंदा नहीं मानकर रिवेश मानते हैं। देश में लम्बे समय से चंदे के धंधे को पारदर्शी बनाने की मांग चलती आ रही है।
सरकारें आती हैं, बदल जाती हैं लेकिन चंदे का खेल है कि हर साल दिन दूना रात चौगुना फलता-फूलता जा रहा है। चंदे के पैसे से ये राजनीतिक दल परोपकरा के कार्य नहीं करते। पैसे का इसतेमाल होता है, चुनाव जीतने के लिए। नेताओं के लिए चार्टर प्लेन में। पार्टी की पांच सितारा होटलों में होने वाली बैठकों पर चंदे के पैसों को पानी की तरह बहाया जाता है। शायद इसीलिए साल-दर-साल राजनीतिक दलों की सेवा बढ़तमी जा रही है। पिछले लोक सभा चुनाव सफर में भाग्य आजमाया था। इनमें से चार सौ से अधिक दलों का तो खाता भी नहीं खुल पाया। भारत जैसे विकासशील देश के लिए क्या ये चीजें शोभा देती हैं? जिस देश के करोड़ों लोग आजादी के 70 साल बाद भी रोटी-कपड़ा और मकान के लिए तरस रहे हों, उस देश के नेता पांच सितारा जिंदगी जिएं। मेहनत के पैसों से नहीं, बल्कि चंदे के पैसों से। कांग्रेस हो या भाजपा, वामपंथी दल हों अथवा सपा-बसपा। सब आम आदमी की बात करते हैं। लेकिन उनकी सुध लेने की परवाह किसी को भी नहीं। परवाह है तो अपनी कमाई बढ़ाने की। फिर उस कमाई को लुटाने की।