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JitendraGuthriya


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्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मोतीहारी में आयोजित महात्‍मा गांधी के चंपारण सत्‍याग्रह शताब्‍दी समारोह की समापन सभा को स्‍वच्‍छाग्रह में बदलकर सिर्फ यह संकेत दिया है कि सरकार विकास के एजेंडे के पीछे नहीं हटाने वाली है बल्कि समाज में बढ़ते विभाजन को भी उसी से पाटने की कोशिश करेगी। इसीलिए उन्‍होंने अपने 2014 के आम चुनाव के नारे सबका साथ सबका विकास को दोहराते हुए कहा कि कुछ लोग तीव्र विकास से परेशान हैं और जन मन को जोड़ने की बजाय उसे तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।द्य इस दौरान उन्‍होंने फ्रांस के सहयोग से चल रहे मधेपुरा के लोकोमोटिव कारखाने में बने 12000 हार्स पावर के इंजन का भी जिक्र किया, जिसने भारत को रूस, चीन, स्‍वीडन और जर्मनी की श्रेणी में पहुंचा दिया है। अपने जोशीले भाषण में मोदी का प्रयास अगले चुनाव के लिए अपनी सरकार का काम गिनाने के साथ ही एनडीए विशेषकर बिहार के उन नेताओं और दलों को एकजुट रखने का दिख रहा था, जिनके असंतुष्‍ट होने की खबरें रही हैं। उससे पहले बिहार के भागलपुर समेत कई जिले सांप्रदायिकता की चपेट में चुके थे। जाति और धर्म के ये टकराव एनडीए को तोड़ रहे हैं। इसलिए सारी सदिच्‍छा के बावजूद मोदी की ये घोषणाएं तभी सफल हो सकती हैं, जब सामाजिक सद्भाव और सामाजिक न्‍याय का वातावरण बने। चाट आंदोलन, मराठा आंदोलन, भीमा कोरेगांव की हिंसा, गोरक्षा के बहाने गुंडागर्दी और फिर भारत बंद का उपद्रव देश को भीतर से खोखला कर रहा है। ऐसे में गांधी के सत्‍याग्रह को स्‍वच्‍छाग्रह में सीमित करने की बजाय गांधी सत्‍या्ग्रह के मूल उद्देश्‍य को समझना होगा। उनके लिए सांप्रदायिक सद्भाव बेहद जरूरी कार्यक्रम था और अगर आंबेडकर को भी उनके साथ जोड़ा जाए तो जाति उन्‍मूलन के बिना भारतीय समाज में शांति नहीं आने वाली है। इन चुनौतियों को दूसरों पर थोपने की बजाय प्रधानमंत्री को उनका मुकाबला करना ही होगा।
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