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JitendraGuthriya
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बेहतर होगा कि इसे किसी सफलता या असफलता से न मापा जाए। यह ऐसा भारत बंद था, जिसके बाद सबकी आंखें खुल जानी चाहिए। अप्रत्यक्ष की अटकलें छोड़ दें, तो प्रत्यक्ष रूप से कोई भी संगठन, कोई भी राजनीतिक दल इसके समर्थन में सामने नहीं आया। किसी भी राजनीतिक गोलबंदी ने इसका आह्वान नहीं किया था। कहीं पोस्टर नहीं चिपके, कहीं बैनर नहीं लटके, न गली-गली इसका प्रचार करने वाले लाउडस्पीकर घूमे। इसके बावजूद कई जगहों पर बंद ने आंशिक ही सही, अपना अस दिखाया। दफ्तर, कारखाने और दुकानें वगैरह भले ही खुले रहे हों, लेकिन प्रदर्शन हुए, हिंसा और आगजनी हुई, झड़पें भी हुईं। कई शहरों में कफ्र्यू भी लगाना पड़ा। अगर सिर्फ सोशल मीडिया के जरिए इतना बड़ा कांड हो सकता है, तो चिंता की बात है। उस माध्यम से, जहाँ सच से ज्यादा बड़ा कारोबार फर्जी खबरों यानी फेक न्यूज का होता है। अभी तक हम यही मानते रहे हैं कि समाज-विरोधी ताकतें सोशल मीडिया के जरिए तनाव पैदा करती रही हैं। इसकी वजह से कुछ जगह दंगे होने की खबरें भी आती रही हैं। कभी सोशल मीडिया की ही एक अफवाह के कारण पूर्वोत्तर भारत के लोगों ने बेंगलुरु को खाली कर दिया था। लेकिन सिर्फ सोशल मीडिया के जरिए ही देशव्यापी स्तर के बंद की गोलबंदी कर ली जाए, ऐसाहमारे सामने यह पहला उदाहरण है। यह घटना जितनी चौंकाती है, उससे ज्यादा परेशान करती है।