words per minute
27
JitendraGuthriya
00:00
Speed
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि वह सीबीआई के विशेष जज मामले को सावधानीपूर्वक और अत्यंत गंभीरता से देख रहा है। इस मामले में बाहर क्या बोला जा रहा है। उस पर उसका ध्यान नहीं है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने वरिष्ठ वकील दुष्यंत दबे को भरोसा दिया कि कोई भी उनहें बहस करने से नहीं रोक सकता। बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन के वकील ने कहा था कि लोया मामले में हस्तक्षेप करने के कारण उन्हें बार काउंसिल ऑफ इंडिया में कारण बताओं नोटिस जारी किया है इसी के जवाब में यह बात बताई अगली सुनवाई 5 मई को होगी चीफ जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि एक सदस्य की मौत हुई है कोर्ट में क्या कहा जा रहा है। हमने पहले दिन कहा था कि यह गंभीर चिंता का विषय है। हम देखेंगे की क्या जांच जरूरी है। अगर हमारी अंतरात्मा कहती है तो जांच का आदेश दे सकते हैं।'' दबे ने दावा किया कि याचिकाकर्ता के वकील भारी दबाव में है, जबकि वो एक कारण के लिए इस केस को लड़ रहे हैं। दबे ने कहा, '' एक जज की मौत रहस्यमय परिस्थितियों में हो गई थी। हम अपने उन आंखों से काम कर रहे हैं। जिन्हें पीठ पर बांध दिया गया है। चीजें वैसी नहीं है, जैसा सतह पर दिखाई पड़ता है। अगर शपथ पत्र नहीं मांगा गया तो मामले में न्याय नहीं हो सकता।'' बेंच ने कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया इस केस के पहले उसके सामने पार्टी नहीं थी। दबे पूरी आजादी के साथ बहस कर सकते हैं। वही महाराष्ट्र के वकील दबे के तर्क का विरोध किया। दबे ने बताया कि 114 सांसदों ने हाल ही में ऐसा नहीं राष्ट्रपति से मामले की जांच एसआईटी से कराने का अनुरोध किया है। इसमें कुछ भी राजनीति नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने रोहतगी को स्पष्ट कर दिया कि वह कोई भी ऐसी सामग्री या कागजात स्वीकार नहीं करेगा, जिसे याचिकाकर्ताओं को नहीं दिया गया है। इससे रोहतगी ने कहा कि जज लोया की आकस्मिक मोत हुई थी। इसमें कुछ भी संदेह करने जैसा नहीं है।
सुनवाई के अंत में सिसौदिया ने कहा कि ''दबे दबाव की बात कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने खुद मुझपर डालने के लिए मीडिया में एक आर्टीकल में लिखा है जिससे में सुनवाई से हट जाऊं।'' मैं अपने लेख पर कायू हूँ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की पैरवी की जांच की बहस कर रहे हैं'' इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा '' जो दबाव हो हम अपना कर्त्तव्य करेंगे।''
सर्वोच्च न्यायालय ने सुभाष महाजन बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के संदर्भ में जो निर्णय दिया है, उसे सही तरीके से समझने की आवश्यकता है। यह स्वागत योग्य निर्णय है, क्येांकि एक ओर संविधन में अनुच्छेद 21 के तहत देश के नागरिकों को प्रदत्त स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार हैं। जबकि दूसरी ओर अनुसूचित जाति और जनजाति के नागरिकों को खिलाफ नफरत फैलाने वाले अपराधों से सुरक्षित करने वाले कानून हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला संविधान के अनुच्छेद और एससी/एसटी एक्ट के बीच समन्वय स्थापित करने वाला है।