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JitendraGuthriya
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छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे महाराष्ट्र के चढ़चिरौली में 16 माओवादियों का मारा जाना न केवल महत्वपूर्ण बल्कि उत्तरोत्तर असर दिखाने वाली घटना है। वर्षों बाद सुरक्षा बलों से मुठभेड़ में इतने माओवादी और उनके दो बड़ेे नेता श्रीकांत व साईनाथ मारे गए हैं। घटना का असर छत्तीसगढ़ में दिख सकता है औश्र यह उचित ही है कि छत्तीसगढ़ में अलर्ट जारी कर दिया गया है। सुरक्षा और राजनीति की दृष्टि से इस हमले का बहुत महत्व है, जिसकी विवेचना होनी चाहिए। सुरक्षा बलों की अगर हम बात करें, तो वे भी माओवादियों के निशाने पर रहते हैं और माओवादियों का पहला हमला इन जवानो को ही झेलना पड़ता है। ऐसे में, यह एक उत्साहजनक सबक है कि सावधानी और तेयारी के साथ मौका देखकर अगर हमला किया जाए, तो हथियार के जोर पर जंगलों पर गैर-संवैधानिक कब्जा जमाए बैठे हिंसक माओवादियों को समाप्त किया जा सकता है।
बहरहाल, इस घटना क चार पहलू हैं। पहला- तेंदूपत्ता संग्रहण के समय माओवादियों द्वारा की जाने वाली वसूली फिर उजागर हुई है। तेंदूपत्ता उनकी कमजोर नब्ज है। माओवादियों की ऐसी आर्थिक या तात्कालिक कमजोरियों से सरकार फायदा उठा सकती है। दूसरा- माओवादियों में तेलंगाना या आंध्र प्रदेश मूल के माओवादियों का प्रभुत्व फिर सामने आया है। जिन राज्यों के ये माओवादी है, वहां विकास की स्थितियां अपेक्षाकृत ठीक हैं, जबकि उसी से लगते छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र के इलाके वंचित हैं। अपनी ऐसी राजनीति या कूटनीति को माओवादी कब तक चला सकते हैं? तीसरा - क्या ये इतना बड़ा हमला है, जिससे माओवादी बातचीत के लिए मजबूर हो जाएं? वे बातचीत को सयम की बर्बादी मानते हैं। ऐसे में क्या सरकार को आगे बढ़कर बातचीत की ठोस पहल करनी चाहिए? संवैधानिक व्यवस्था में बातचीत का दरवाजा खुला रखना चाहिए। चौथा- माओवादी आहत हैं, तो सरकार को ज्यादा सचेत रहना चाहिए, लेकिन माओवाद के नाम पर हिंसा कब तक होती रहेगी। जरूरी है, सरकारें सुरक्षा के साथ-साथ विकास के मोर्चे पर भी पूरा ध्यान दें। अतंत: वनवासियों का समेकित विकास ही माओवादी हिंसा का अंत करेगा।