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LomasVerma
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महोदय, संस्थाओं के अनुदान के संदर्भ में जब मंत्रालय के बदले निदेशालय से पत्र व्यवहार हुआ तो इस परिवर्तन का पता लगा। संभव है इसलिए इस वर्ष हिंदी प्रचारार्थ अनुदान ने स्वीकृति में इतना विलंब हुआ। फिर भी हमें पूर्ण आशा है कि जनवरी 1995 के बाद संस्वीकृति पत्र सभी संस्थाओं को प्राप्त हो जाएँ, क्योंकि स्वीकृति अनुदान के आधार पर ही निर्धारित समय में ही सारे कार्य पूर्ण करने आवश्यक होते हैं। केन्द्रीय सरकार के मंत्रालयों ने कार्य सदा ही इस अवधि में मंत्री-मण्डल में हेर-फेर और पुर्नगठन विलंब के लिए उतना ही उत्तरदायित्व है, जितना कि कुछ राज्यों के निर्वाचन आयोग द्वारा कुछ बातों पर सरलता के आरक्षण का प्रश्न भी है। यही कारण है कि केन्द्र सरकार ने बजट सत्र भी इस वर्ष विलंब से हो रहा है। फिर भी सरकारी कार्य अपने नियमों के अनुसार चलते रहेंगे। हम फिर विश्वास प्रकट करते हुए कहते हैं कि हिंदी प्रचार संबंधी अनुदान स्वीकृति पर कुछ परिवर्तनों से कोई विशिष्ट परिणाम नहीं होगा, क्योंकि हिंदी प्रचार राष्ट्रीय कार्य है। वह सदैव चलता रहेगा और इसके लिए केंद्रीय सहायता भी प्राप्त होती रहेगी।
हमारी जन-भाषाओं के पास शब्दों का विशाल भंडार भी है। जरूरत है उस ऐतिहासिक विरासत और उस शब्द भंडार को उपर्युक्त शब्दों की तलाश करके उन्हें मान्यता प्रदान करने की। मुझे लगता है कि ऐसा करके हम अपनी राजभाषा को सही मायनों में व्यावहारिक भाषा बना सकेंगे। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अभी भी हमारे देश के आधे से अधिक लोग निरक्षर हैं और इस अवसर पर एक बात और कहना चाहूँगा, यह बात अनुदान के बारे में है।