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AvdheshKumar6242
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विश्वविद्यालय ने कहा कि उसके पास कानूनी विश्वास के तहत उपलब्ध सूचना का खुलासा करने का केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा उसे निर्देश देना पूर्णत: गैर कानूनी है, खासकरतब जब ऐसे खुलासे से व्यापक जनहित की कोई दरकार नहीं है। केंद्रीय सूचना आयोग विश्वविद्यालय को परीक्षा परिणाम दिखाने का आदेश दिया था। उसने विश्वविद्यालय के केंद्रीय जन सूचना अधिकारी की यह दलील खारिज कर दी थी कि यह तीसरे पक्ष की सूचना है। केंद्रीय सूचना आयोग ने कहा था कि केंद्रीय जन सूचना अधिकारी की दलील में न तो दम है और नही कानूनी वैधता। उसने विश्वविद्यालय को उस प्रासंगिक रजिस्ट्रर को दिखाने में सहयोग का निर्देश दिया था जिनमें 1978 में बीए की परीक्षा पास करने वाले सभी विद्यार्थिया के परीक्षा परिणाम शामिल है। उसने विश्वविद्यालय को रजिस्ट्रर में दर्ज विद्यार्थी के क्रमांक, उनके नाम, उ नके पिता के नाम, प्राप्तांक आदि मुफ्त उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया था।
केंद्रीय सूचना आयोग ने कहा था कि जहां तक इस बात का सवाल है कि क्या ऐसी पहचान सबंधी सूचना के खुलासे से निजता का उल्लघंन होता है या नहीं या फिर क्या यह निजता का अवांछनीय हमला है या नहीं, तो जन सूचना अधिकारी ने यह दर्शाने के लिए कोई सबूत नहीं दिया या संभावना की व्याख्या नहीं की कि डिग्री संबंधी सूचना के खुलासे से निजता का उल्लंघन होता है या निजता पर अवांछनीय हमला है। सेवानिवृत्त जज, जिला जज और महाधिवक्ताओं को आजीवन चौबीस घंटे सुरक्षा देने के जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षा समीक्षा समन्वय समिति से कहा कि वह चार सप्ताह के भीतर सुरक्षा स्थिति का आकलन करके आवश्यकतानुसार पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करें। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुरक्षा के बारे में हाईकोर्ट के आदेश इस संबंध में संशोधित किए जाते है।
एनडीटीवी वेबसाइट पर आशीष भार्गव लिखते है कि जम्मू-कश्मीर सरकार ने सेवानिवृत्त जज और पूर्व एडवोकेट जनरलों को सुरक्षा देने के हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने हाईकोर्ट के आदेश का विरोध करते हुए कहा कि सेवानिवृत्त जजों को सुरक्षा देने का आदेश ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि पूरे देश में वीआईपी व अन्य किसी को भी सुरक्षा गृह मंत्रालय द्वारा तथा दिशानिर्देशों में उस व्यक्ति की जान को होने वाले खतरे को देखते हुए दी जाती है। इस बारे में विस्तृत दिशानिर्देश और व्यापक तंत्र बना हुआ है पूरे देश में उसी का पालन होता है। ये कार्यपालिका का विशेषज्ञता वाला काम है। इसमें इस तरह हाईकोर्ट आदेश नहीं दे सकता।