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AviGupta
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कश्मीर के हालात जिस तरह दिन-प्रतिदिन खराब होते नजर आ रहे हैं उसे देखते हुए केंद्र सरकार को वहा कुछ करना ही होगा। उसे एक ओर जहां सीमा पार आतंकवाद को रोकने के मामले में कोई कड़े कदम उठाने होंगे वहीं सीमा के अंदर हालात संभालने के लिए भी सक्रियता दिखानी होगी। कश्मीर में केन्द्र भाजपा के समर्थन वाली दरकार इसलिए और भी है, क्योंकि भाजपा के समर्थन वाली महबूबा मुफ्ती के पास ले-देकर यही सुझाव है कि भारत सरकार को कश्मीर में सभी पक्षों से बात करनी चाहिए। सभी पक्षों से उनका आशय हुर्रियत कांफ्रेस सरीखे पाकिस्तान परस्त संगठनों से भी है। आखिर आतंकियों का खुला समर्थन करने के साथ ही आजादी की बेतुकी बात की मांग करने वाले किसी भी संगठन के साथ बात क्यों की जानी चाहिए? इसमें कोई दोराय नहीं है कि बतौर मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का अब तक का कार्यकाल निराशाजनक रहा है। उनकी न तो घाटी के लोगों पर कोई पकड़ नजर आ रही है। और नहि पुलिस प्रशासन पर। शायद इसकी एक बड़ी बजह यह है कि खुद उनके दल-पीडीपी के कई नेता भी पत्थरबाजी की बढती घटनाओं भी यह बताती है कि हिंसा फैलाने वाले तत्वों को मुख्यधारा के राजनितिज्ञ दल बढ़ावा दे रहे हैं। इसका एक प्रमाण यह है कि नेशनल कांफ्रेस के बड़े नेता भी पत्थरबाजों की खुली हिमायत करने में लगे हुए हैं। नि-संदेह कश्मीर में सभी न तो पत्थरबाज हैं और नही पकिस्तान के समर्थक, लेकिन उन्हें नेतृत्व देने वाला या फिर उनकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं हैं। कम से कम भारत सरकार को तो किसी जतन से ऐसे लोगों तक पहुचना ही चाहिए। केन्द्र सरकार केवल यह कह कर कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर सकती कि पाकिस्तान कश्मीर के हालात को विगड़ने में लगा हुआ है। पाकिस्तान यह काम न जाने कब से कर रहा है। और अब तो ऐसा लगता है कि वहां की सेना नवाज शरीफ सरकार को यह दिखाने पर तुल गई है कि कश्मीर के मामले में वही होगा जो वह चाहेगी। पनामा काड़ में उलझने के बाद नवाज शरीफ राजनितिक तौर पर इतने दुर्बल नजर आने लगे हैं कि भारत उनसे कोई उम्मीद नहीं कर सकता।