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JaiGautam
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किसी भी देश की उन्नति, उसका चहुंमुखी विकास उस देश के शिक्षित नागरिकों पर निर्भर करता है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि जिस समय हमारा देश स्वतन्त्र हुआ हमारे देश में निरक्षरों की तादाद बहुत थी। अधिकांशत: लोग निरक्षर थे। हमारा देश ग्रामप्रधान देश ग्रामप्रधान देश है और गांवों में रहने वाले 99 प्रतिशत लोग उस समय अशिक्षित थे। एसी स्थिति में भारत की प्रगति की कल्पना करना चन्द्रमा को छूने के समान था, लेकिन देश के कर्णधारों, प्रबुद्ध नेताओं ने, इस समस्या की ओर गम्भीरता से ध्यान दिया। एक ओर जहां बच्चों और किशोरों के लिए नये-नये विद्यालय खोले गयेेे,शिक्षा को बच्चों के लिए अनिवार्य बनाया गया वहीं दूसरी ओर अशिक्षित प्रौढ़ो के लिए भी शिक्षा की व्यवस्था की गई। शिक्षा केन्द्र बनाए गये। खेतों में काम करने वाले मजदूर स्त्री-पुरुष या इसी प्रकार अपनी रोजी-रोटी कमाने वाले अशिक्षित स्त्री-पुरुष दिन मेें तो विद्यालय नहीं जा सकते थे। इसीलिए उनकी शिक्षा के लिए सन्ध्या के समय विद्यालय चलाने का निर्णय लिया गया। प्रौढ़-शिक्षा से हमारा यही आशय है कि ऐसे व्यक्तियों को शिक्षा प्रदान की जाए जो विषम परिस्थितियों में रहने के कारण परम्परागत रूप से शिक्षा नहीं प्राप्त कर सकते। प्रौढ़ शिक्षा का एक और भी उद्देश्य निश्चत किया गया कि प्रौढ़ों को न केवल साक्षर बनाना है अपितु अन्य व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा देकर आत्मनिर्भर भी बनाना है। वे भी शिक्षित व्यक्तियों की तरह सम्पन्नता से अपना जीवन-यापन कर सकें। निरक्षरता के कारण विशेष रूप से हमारे किसान भाइयों को जमींदारोंं केे शोषण का शिकार होना पड़ता था। एक बार कर्जा लेने पर उन्हें जीवन पर्यन्त बहीखाते में अंगूठे का निशान लगाना पड़ता था। और कर्जा था कि उतरता ही नहीं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी उस कर्जे की रकम को उतारने में लगी रहती थी। मूल धन की तो बात ही क्या, ब्याज जुटाना भी उनके लिए कठिन था। किन्तु यहां पर यह भी कहना आवश्यक है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी हर किसान साक्षर एवं समृद्ध हो सका है। आज भी किसानों की स्िथति शोचनीय है। जो किसान धनवान हैं उनकी बात छोड़ दी जाये लेकिन जिन किसानों के पास जमीन के छोटे से टुकड़े रह गये हैं वे आज भी अत्यन्त दरिद्रता और असमर्थता का जीवन जी रहे हैंं।