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जगदीश चंद्र बोस का जन्म 3; नवम्बर 1858 को बंगाल अब के बांग्लादेश में ढाका जिले के फरीदपुर के मेमनसिंह में हुआ था। उनके पिता भगवान चंद्र बोस फरीदपुर, बर्धमान एवं अन्य जगहों पर उप-मैजिस्ट्रेट या सहायक कमिश्नर थे। ग्यारह वर्ष की आयु तक बोस ने गांव के ही एक स्कूल में शिक्षा ग्रहण की। बोस की शिक्षा एक बांग्ला स्कूल में प्रारंभ हुई। उनके पिता मानते थे कि अंग्रेजी सीखने से पहले अपनी मातृभाषा अन्छे से आनी चाहिए। जगदीश चंद्र बोस बहुशास्त्र ज्ञानी, भौतिकशास्त्री, जीवविज्ञानी, वनस्पतिविज्ञानि, पुरातात्विक थे और साथ ही वैज्ञानिक विज्ञान में उन्होंनें कई महत्वपूर्ण खोजें की। साथ ही वे भारत के पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने रेडियो और सूक्ष्म तरंगों की प्रकाशिकी पर कार्य किया। वनस्पति विज्ञान में उन्होंनें कई महत्वपूर्ण खोजें की। साथ ही वे भारत के पहले वैज्ञानिक शोधकर्ता थे। वे भारत के पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने एक अमरीकन पेटेंट प्राप्त किया। उन्हें रेडियों विज्ञान का पिता माना जाता है। वे विज्ञान कथाएं भी लिखते थे और उन्हें बंगाली विज्ञानकथा-साहित्य का पिता भी माना जाता है। इन्होंने एक यन्त्र क्रेस्कोग्राफ का आविष्कार किया और इससे विभिन्न उत्तेजकों के प्रति पौधों की प्रतिक्रिया का अध्ययन किया। उनके योगदान को देखते हुए चांद पर मौजूद ज्वालामुखी विवर को भी उन्ही के नाम पर रखा गया। ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रांत में जन्मे बसु ने सेन्ट जैवियर युनिवर्सिटी, कलकत्ता से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। बाद में बोस लंदन युनिवर्सिटी में चिकित्सा की शिक्षा लेने गए, लेकिन स्वास्थ्य की समस्याओं के चलते उन्हें यह शिक्षा बीच में ही छोड कर भारत वापस आना पडा। उन्होंने बेतार के संकेत भेजने में असाधारण प्रगति की और सबसे पहले रेडियों संदेशों को पकडने के लिए अर्धचालकों का प्रयोग करना शुरू किया। लेकिन अपनी खोजों से व्यावसायिक लाभ उठाने की जगह उन्होंने इन्हें सार्वजनिक रूप से प्रकाशित कर दिया ताकि अन्य शोधकर्ता इनपर आगे काम कर सके। इसके बाद उन्होंने वनस्पति जीवविज्ञान में अनेक खोजें की। उन्होंने एक यन्त्र क्रेस्कोग्राफ का अविष्कार किया और इससे विभिन्न उत्तेजकों के प्रति पौधों की प्रतिक्रिया का अध्ययन किया। इस तरह से उन्होंने सिद्ध किया कि वनस्पतियों और पशुओं के उतकों में काफी समानता है। अपने इस अविष्कार के लिए पेटेंट भी दिया गया। उनके अविष्कारों ने विज्ञान की दुनिया में कई रिकार्ड भी स्थापित किये। उनके यंत्रों का परिणाम काफी अच्छा था। उन्होंने पौधों के के महसूस करने की शक्ति के बारे में भी काफी खोज की और साथ ही बीमार पौधों को सुधारने में भी उनका काफी योगदान रहा। इससे संबंधित उनकी दो किताबें लिविंग एंड नॉन-लिविंग, 1902 और दि नर्वस मैकेनिज्म ऑफ प्लांट, 1926 को भी प्रकाशित किया गया।