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AjayAjay1441230
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अभी राजनीतिक दलों व नेताओं के लिए महज आठ से दस माह का समय ही शेष बचा है, जिसमें वो लोकसभा चुनावों की तैयारियां पूर्ण कर सकते हैं। इसके बाद तो मतदाताओं को उनके भाग्य का फैसला करना ही करना है। ऐसे में देश की चार लोकसभा सीटों में से तीन का भाजपा के हाथ से फिसलकर विपक्ष की झोली में चले जाना बिजली के 444 बोल्ड के करंट जैसा ही प्रतीत हो रहा है। वहीं कैराना के निराशाजनक परिणामों ने तो मानों भाजपा की पूरी रणनीति को ही फेल करार दिया है। कुल मिलाकर भाजपा के लिए यह पराजय दुधारी तलवार साबित हो रही है। फूलपुर व गोरखपुर पराजय के बाद अब जो परिणाम सामने आएं हैं उससे मोदी लहर के थमने का संकेत तो मिलता ही मिलता है, साथ ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जो कि बराबर दूसरे राज्यों के चुनाव प्रचार में किसी स्टार प्रचारक के तौर पर देखे जा रहे थे का भी रुतबा कम होते साफ दिख रहा है। अपने ही राज्य में भाजपा की सीट नहीं बचा पाना अपने आपमें सवाल खड़े करने जैसा है। चूंकि कैराना किसान और जाट बहुल क्षेत्र है अत: भाजपा की हार आगे भी काफी कष्टकारी साबित होने वाली है। यह इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि देशभर के मतदाताओं को साधने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास समय बहुत कम बचा है, उस पर उनका जादू का असर भी अब खत्म प्राय: होने को आया है। उनके कार्यकाल में पिछले चार सालों तक जनता ने जो कष्ट भोगे हैं उसका भी हिसाब अब लिया जाने लगा है। आम जन के आंसुओं की जिम्मेदारी का ठीकरा भी मोदी सरकार के सिर पर ही फोड़ा जा रहा है। यह काम विरोधी नहीं बल्कि उनके अपने ही करते देखे जा रहे हैं, खासतौर पर भाजपा सांसद शत्रुघ्न सिन्हां के बयानों को देख लें, जिसमें वो कहते देखे जातें हैं कि जब जीत का सेहरा मोदी जी के सिर सजता है तो हार और सरकार की नाकामियों का ठीकरा भी उन्हीं के सिर फूटना ही चाहिए।