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gouravkantsahu
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इस साल के पहले ही दिन पुणे के भईमा-कोरेगांव में हुई हिंसा ने सारे देश को चौंकाने के साथ ही चिंतित भी किया था। किसी के लिए भी यह समझना कठिन था कि दो सौ साल पहले अंग्रेजों और पेशवाओं के बीच हुए युद्ध की स्मृति में होने वाले आयोजन के दौरान हिंसा क्यों भड़की ऐसा लगता है कि पुणे पुलिस की ओर से पांच नक्सल समर्थकों की गिरफ्तारी इस सवाल का जवाब देने के साथ-साथ इस गुत्थी को भी सुलझाने में भी मददगार साबित हगी कि भीमा-कोरेगांव हिंसा के विरोध में बुलाए गए महाराष्ट्र बंद के दौरान हिंसक व्यवहार देखने को क्यों मिला?पुणे पुलिस के अनुसार भीमा-कोरेगांव में हिंसा को भड़काने का काम इन्हीं पांच नक्सल समर्थकों ने किया था। हिंसा पर यकीन रखने वाले नक्सली तत्वों का किसी हिंसक घटना में हाथ नजर आना अस्वाभाविक नहीं, लेकिन यह सामान्य बात नहीं है कि पुणे पुलिस ने जिन पांच नक्सल समर्थकों को मुंबई, नागपुर, दिल्ली आदि से भीमा-कोरेगांव में हिंसा भड़काने का दोषी मानकर गिरफ्तार किया है उनमें प्रोफेसर, वकील और संपादक भई हैं। इनमें से कुछ पहले बी नक्सलियों की मदद करने के आरोप में गिरफ्तार हो चुके हैं। एक अन्य दिल्ली विश्वविद्यालय के नक्सल समर्थक प्रोफेसर जीएन साईबाबा का साथी रहा है। ध्यान रहे कि जीएन साईबाबा को नक्सलियों की मदद करने का दोषी पाया गया है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं कि भीमा-कोरेगांव में हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार नक्सल समर्थक तत्वों के खिलाफ पुणे पुलिस के पास कितने पुख्ता सुबूत है और वे उन्हें सजा दिलाने में पर्याप्त साबित होंगे या नहीं, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं कि जा सकती कि तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग के बीच नक्सलियों के समर्थक पनप रहे हैं। ऐसे तत्व उन नक्सलियों से कहीं अधिक खतरनाक हैं जो हथियार उठाए और पुलिस से बचते फिरते हैं। आज के इस युग में यह कल्पना कना कठिन है कि महानगरों में रह रहे प्रोफेसर , वकील आदि नक्लवाद जैसी हिंसक विचारधारा के सक्रिय समर्थक हो सकते हैं। ये शहरी नक्सली समाज और देश के लिए कहीं बड़ा खतरा हैं। इन पर लगाम लगाना इसलिए आसान नहीं, क्योंकि यह जानना कठिन है कि वे वैचारिक तौर पर लोकतंत्र और संविधान के बैरी बन गए हैं। ऐसे तत्व एक तरह से देश को अंदर ही अंदर खोखला करने का काम करते हैं। विडंबना यह है कि आज जब नक्सली संगटन माफिया की तरह काम कर रहे हैं। तब कुछ ऐसे कथित विचारक भी हैं जो उन्हें वैचारिक कुराफ प्रदान करते हैं। क्या यह किसी से छिपा है कि कैसे नक्सलियों का यह कहकर महिमा मंडन किया जा रहा है। कि वे तो बंदूकधारी गांधीवादी हैं? हौरानी नहीं कि जल्द ही कोई बुद्धिजीवनी के भेष वाले नक्सल समर्थक तत्वों का गुणगान करना नजर आए। जो भी हो, खतरा केवल बर्बर नक्सलियों का समर्थन करने वाले तत्वों से ही नहीं है। खतरा उनसे भी है जो लोकतंत्र मानवाधिकरों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक होने का दावा करते हैं, लेकिन अपने कार्य-व्यवहार के जरिये मौजूदा शासन व्यवस्था को खारिज करते हैं। बेहतर हो कि पुलिस एवं खुफिया एजेंसियां शहरी नक्सलियों की टोह लेने का काम प्राथमिकता के आधार पर करें।