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rajuchichalwar
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उस सरोवर के पास के तपोवन में महातपस्वी जाबाली नाम के महामुनि रहते है। उनका पुत्र मुनि कुमार हारीत अपने समान आयु वाले तपस्वी कुमारों के साथ उसी मार्ग से उसी सरोवर में स्नान करने के लिए आया। वे स्फटिक अक्ष-वलय से सुशोभित थे और उनके कंधे पर पड़ा हुआ यज्ञोपवीत हवा से हिल रहा था। विश्व में प्राय: संतों के चित्त अकारण मैत्री भाव और करुणा से आर्द्र होते है। मुझे उस अवस्था में देखकर उनके हृदय में दया उमड़ आयी और वे समीप स्थित एक ऋषि कुमार से बोले- ‘यह शुक-शावक जिसके अभी पंख नही जमे है किसी प्रकार वृक्ष की शाखा से गिर पड़ा है। अथवा किसी बाज पक्षी के मुख से छुट गया है। यह अपनी आँखे बारबार मीच रहा है और लम्बी -लम्बी सांसे ले रहा है। यह मुख के बल गिरा पड़ा है और अपना सिर भी पृथ्वी पर नहीं रख पा रहा है, मानो अब इसका जीवन थोड़ा ही शेष है, इसीलिए जब तक इसके प्राण इसे नहीं छोड़ रहे है तब तक इसे ले लो और जल के समीप ले चलो।’ऐसा कह कर वह मुझे सरोवर के तट पर ले गया।
तत्पश्चात जल के समीप ले जाकर उसने स्वयं मुझे उठाकर अंगुली से जल की कुछ बूँदे पिलायी और कमलिनी के पत्ते की शीतल छाया में मुझे बिठाकर समुचित स्नान किया।
स्नानोपरान्त प्राणायाम करने के पश्चात लाल-लाल कमल पुष्पों से भगवान सूर्य को अर्ध्य अर्पित किया और सभी मुनि-कुमारों के साथ ममुझे लेकर धीरे-धीरे तपोवन की ओर चल पड़ा। थोड़ी ही दूर जाने के पश्चात अति ररमणीय दूसरे बह्मलोक की भांति मैंने एक आश्रम देखा। जहां ब्रह्मचारी गण अध्ययन कर रहे थे, अतिथि वृन्दों की सेवा हो रही थी, ब्रह्मा-विष्णु -महेश की अर्चना हो रही थी, यज्ञ-विद्या का व्याख्यान हो रहा था, विविध पुस्तकें पढ़ायी जा रही थी, समस्त शास्त्रों पर विचार हो रहा था, पर्ण-शालाएं बनायी जा रही थीं, आँगन लीपा जा रहा था, ध्यान लगाया जा रहा था, मंत्रों को किया जा रहा था ,योग का अभ्यास हो रहा था, वल्कलों को धोया जा रहा था, समिधाएं एकत्रित की जा रही थीं, रुद्राक्ष गूँथी जा रही थीं, त्रिपुण्ड लगाये जा रहे थे और कण्डल भरे जा रहे थे।