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ManujMishra1495377
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उ. कोरिया की आणविक तैयारी 1950 के कोरियाई युद्ध के बाद से ही शुरू हो गई थी। इस प्रयास में उसे रूस और चीन से मदद मिली थी। 2003 में पश्चिमी दुनिया को इस बात की जानकारी मिली। उसके बाद से ही अमेरिका ने वैिक कसना शुरू कर दिया था। 2006 में उत्तर कोरिया ने पहला आणविक परीक्षण कर अपनी बात सिद्ध कर दी। तब से लेकर अमेरिकी नजरों में उत्तर कोरिया सूई की तरह चुभता रहा। स्थिति इतनी भयानक हो गई की उत्तर कोरिया अमेरिका जैसे देश को सबक सिखाने की धौंस देने लगा।यह भी सच है कि पूरी दुनिया में उत्तर कोरिया का हितैषी चीन और अमेरिका के सिवा कोई नहीं है। फिलहाल दुनिया में कई तरह के विवाद युद्ध की आशंका को पैदा कर रहे हैं। सीरिया को लेकर अमेरिका और रूस एक-दूसरे के आमने-सामने हैं। उत्तर कोरिया और अमेरिकी द्वंद्व में चीन भी शामिल है। पूर्वी एशिया के तमाम देश भी प्रभावित हैं। इसलिए इस वार्ता का काफी महत्त्व है। प्रश्न कई हैं। पहला क्या उ. कोरिया इस वार्ता को हजम कर पाएगा? अमेरिका का इतिहास विश्वसनीय नहीं रहा है। लीबिया में अमेरिका ने यही किया था। कर्नल गद्दाफी द्वारा पूरे किए गए वादों के बाद भी अमेरिका ने किस तरह से लीबिया को बर्बाद किया और गद्दाफी को तिल-तिल कर मार डाला, यह हर कोई जानता है। किम के सामने लीबिया की दास्ता भी याद दिलाई गई होगी। उ. कोरिया की राजनीति दो अहम सिद्धांतों पर चलती रही है। पहला ‘‘जूचे’ यानी अति राष्ट्रीयता और दूसरा ‘‘सोंगम’ अर्थात सैनिक तानाशाही। अगर वार्ता द्वारा इस सिद्धांत को बदला जाता है तो इसके अहम राजनीतिक और आर्थिक परिणाम निकलेंगे।