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BrijeshPatel
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उस दिन बड़े सवेरे श्यामू की नींद खुली तो उसने देखा घर भर में कुहराम मजा हुआ है। उसकी माँ नीचे से ऊपर तक एक कपड़ा ओढ़े हुए कम्बल पर भू5मि-शयन कर ही है और घर के सब लोग उसे घेर कर बड़े करउण स्वर में विलप कर रहे हैं।
लोग जब उसकी माँ को श्मशान ले जाने लिए उठने लगे, तब श्यमू ने बड़ा उपद्रव मचाया। लोगों के हाथ से छूटकर वह णाँ के ऊपर जा गिलाय। बोला, काकी सो रही है। इसे इस तरह उठा कर गहाँ ले जा रहे हो मै इसे न ले जाने दूँगा।
लोगोने बड़ी कठिकनाई से उसे हटया । काकी के अग्नि-संस्कार में भी वह न जा सका। एक दासी राम-राम करके उसे घर पर ही सँभाले रही।
यद्यपि बुद्धिमान गुरुजनों ने उसे विश्वास दिया कि उसकी काकी उसके मामा के यहाँ गयी है, परन्तु यह बात उससे छिपी न रह सकी कि काकी और कहीं नहीं ऊपर राम के यहाँ गयी है, काकी के लिए कई दिन लगातार रोते-रोते उसका रूदन तो धीरे-धीरे शान्त हो गया, परन्तु शोक शान्त न हो सका। वह प्रायः अकेला बैठा-बैठा शून्य मन से अकाश की ओर ताका करता।
एक दिन उसने ऊपर जाकर एक पतंग उड़ती देखी। न जाने क्या सोचकर उसकी हृदय एकदम खिल उठा। पिता के पास जाकर बोला, काका मुझे पतंग मँगा दो अभी मँगा दो।
पत्नी की मृत्यु के बाद से विश्वेशवर बहुत अनमने से रहते थे। अच्छा मँगा दूँगा, कहकर वे उदास भाव से और कहीं चले गये।
शयामू पतंग के लिए बहुत उत्कंठित था। वह फनी अइच्छा को किसी तरह न रोक सका। एक दिन जगह खूँटी पर विशवेशवर का कोट टँगा था। इधर-उधर देखकर उसके पास स्टूल सरका कर रहा और ऊपर चढ़कर कोट की जेबें टटोली।