words per minute

6

user1637064


00:00

Speed

न्म की एक कथा कुछ इस प्रकार है। अंधकासुर नामक दैत्य को तप के बाद भगवान शिव ने वरदान दिया था कि उसके रक्त से सैकड़ों दैत्य जन्म लेंगे। वरदान पाकर इस दैत्य ने अवंतिका में तबाही मचा दी। तब दीन-दुखियों ने शिव से प्रार्थना की। भक्तों के संकट दूर करने के लिए स्वयं शंभु ने अंधकासुर से युद्ध किया। दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ। शिव का पसीना बहने लगा। रुद्र के पसीने की बूंद की गर्मी से उज्जैन की धरती फट कर दो भागों में विभक्त हो गई और मंगल ग्रह का जन्म हुआ। शिवजी ने दैत्य का संहार किया और उसकी रक्त की बूंदों को नवोत्पन्न मंगल ग्रह ने अपने अंदर समा लिया। कहते हैं, इसलिए मंगल की धरती लाल रंग की है.16 जुलाई से सूर्यदेव ने कर्क राशि में प्रवेश कर लिया है। सूर्य के कर्क में प्रवेश करने के कारण ही इसे कर्क संक्रांति कहा जाता है। इस दिन सूर्य देव के साथ ही अन्य देवता गण भी निद्रा में चले जाते हैं। सृष्टि का भार भोलेनाथ संभालेंगे इसीलिए श्रावण मास में शिव पूजन का महत्व बढ़ जाता है। 28 जुलाई से श्रावण मास आरंभ हो जाएगा वहीं श्रावण का प्रथम सोमवार 30 जुलाई को रहा है। 27 जुलाई को गुरु पूर्णिमा के अलावा चंद्र ग्रहण भी है। इस तरह से अब जो त्योहारों की कड़ी आरंभ होगी तो वर्षांत तक जारी रहेगी।कर्क संक्रांति से भगवान विष्णु के पूजन का खास महत्व होता है यह पूजन एकादशी तक निरंतर जारी रहता है क्योंकि इस एकादशी के दिन विष्णु देव शयन आरंभ कर देते हैं। इसीलिए इसे देवशयनी एकादशी कहते हैं। इस दिन से 4 महीनों के लिए देव शयन करने चले जाते हैं। कर्क संक्रांति के दिन कपड़े, खाद्य सामग्री और तेल दान का बहुत महत्व होता है। इस संक्रांति को मानसून के प्रारंभ के रूप में भी जाना जाता है। कर्क संक्रांति के साथ शुरू होने वाला दक्षिणायन मकर संक्रांति पर समाप्त होता है जिसके बाद उत्तरायण प्रारंभ होता है। दक्षिणायन के चारों महीनों में भगवान विष्णु और भगवान शिव का पूजन किया जाता है। इस बीच लोग अपने पितरों की शांति के लिए पूजन अथवा पिंडदान आदि भी करते हैं। कर्क संक्रांति को किसी भी शुभ और महत्वपूर्ण नए कार्य के प्रारंभ के लिए शुभ नहीं माना जाता है। इस समय किए जाने वाले कार्यों में देवों का आशीर्वाद नहीं मिलता।
words per minute
0
wpm
accuracy
0%
Text Practice - Time 650 - English

words per minute