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muneshsahu
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पढ़ाई में मै बहुत अच्छा नही हूँ, अतः कभी प्रथम आने का सपना भी नहीं देखता। इस बार अपने मित्र को देख मैंने भी नियमित पढ़ाई प्रारंभ कर दी ताकि अच्छे अंक लाकर अपने अध्यापक और माता-पिता को आश्चर्य में डाल दूँ। तब भी प्रथम आ सकता हूँ, यह विचार मन मं नहीं आया। अब प्रतिदिन कक्षा में पढ़ाए गए अंश को घर में दोहराता। अपनी शंकाओं के समाधान के लिए मित्रों की सहायता लेता या कभी-कभार अध्यपकों से पूछ लेता। एक दिन परीक्षा शुरु हो गई। पेपर अच्छे हुए थे। अंक भी अच्छे आ ही जाएँगे, ऐसा विचार था। जिस दिन परीक्षा परिणाम मिलनेवाल था, उससे पहले हर बार की तरह घबराहट थी। न जाने इस बार कि विषय की परीक्षा दुबारा देनी पड़ जाए, पर तभी मन कहता – नहीं ऐसा नहीं होगा इस बार। तुमने काफ़ी मेहनत की है। इसी मानसिक स्थिति में मै अपनी दीदी के साथ विद्यालय पहुँचा। अध्यपिका जी ने मुसकुराते हए रिपोर्ट कार्ड पकड़ाया और बधाई दी। बाकी उन्होंने क्या कहा, मैंने सुना ही नहीं। कार्ड में लिखा था कि मैंने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। विश्वास ही नहीं हुआ। कभी कार्ड पर अपना नाम पढ़ता तो कभी अंक और कभी प्रथम। समझ नहीं आ रहा था, ऐसा कैसे हो गया।
जैसा करोगे वैसा भरोगे
किसी ने ठीक कहा है जैसा करोगे वैसा भरोगे। इस संसार में व्यक्ति जैसा करता है, वैसा ही फल पाता है। अच्छा करनेवाले का अपने आप ही भला हो जाता है। बबूल लगाने से आम नहीं मिलता, जो इस तथ्य से परिचित हो जाता है, वह कुछ भी गलत करने से पहले दस बार सोचता है, विचारता है। आज ऐसा भ्रम हो गया है कि बुरे काम करनेवाला फल-फूल रहा है, पर यह स्थिति ज़्यादा दिन नहीं चलनेवाली। भगवान के घर देर हो सकती है, अंधेर नहीं। अच्छा कार्य करनेवाले को उसका फल अवश्य मिलता है, चाहे उस फल की प्राप्ति में देर ही क्यों न हो जाए। हमें चाहिए कि अच्छे कार्य करते जाएँ, दूसरों को सुख देने का हर संभव प्रयास करें।