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जब अंतिम परीक्षा की बारी आती तो मेरी चिंता का कारण बस यही होता था कि मैं अपने से जूनियर बच्चों के साथ कहीं पीछे न छूट जाऊं, जो मैं कभी नहीं चाहता था। मैं अपने दोस्तों के साथ अगली कक्षा में जाना चाहता था, इसलिए मैं वह परीक्षा जरुर पास कर लिया करता। अगर आप शुरू से मेरे रिपोर्ट कार्ड पर नजर डालेंगे तो सभी विषयों में मेरे पैंतीस या छत्तीस नंबर होते थे। परीक्षा में जैसे ही मुझे लगता था कि मैंने पास होने लायक नंबर पाने जितना लिख लिया है, वैसे ही मैं परीक्षा छोडक़र उठ खड़ा होता था। मेरे टीचर मुझसे गुजारिश करते थे, कृपया बैठ जाओ और लिखो।मेरा जवाब होता, इसका कोई मतलब ही नहीं है, मुझे पैंतीस नंबर मिल जाएंगे और मैं अगली कक्षा में चला जाऊंगा। मेरे लिए बस यही काफी है।उतना छोड़कर मेरी किसी और चीज में कोई रुचि नहीं थी। इसका यह मतलब नहीं था कि मेरी किसी भी चीज में बिलकुल कोई रुचि ही नहीं थी। मैं अपने आसपास की हर चीज को खूब ध्यान से देखता था, जिसकी वजह से हर चीज की ज्यामिति की समझ मेरे भीतर विकसित हो गई। जब मैं आठवीं कक्षा में पहुंचा, तब मेरे गणित के पेपर में तीस नंबर की ज्यामिति, तीस नंबर की अंक-गणित व बचे हुए नंबर की बीज-गणित यानी अलजेब्रा के सवाल होते थे। ज्यामिति में मुझे तीस में तीस नंबर मिलते थे और अंक गणित में पांच नंबर मिलते थे, बस। इसी तरह मैं आगे बढ़ता गया, क्योंकि मेरा ज्यामितीय ज्ञान इस समझ पर टिका था कि हर चीज कैसे खड़ी होती है या कैसे टिकती है। जब भी मैं कोई शरीर देखता हूं तो मेरी नजर उसकी ज्यामिति पर जाती है, उसके रंग, आकार या रूप पर नहीं। अगर मैं बस यह देख लूं कि आप कैसे बैठते हैं या खड़े होते हैं तो मैं आपको बता सकता हूं कि अगले दस सालों में आपके शरीर में कैसी समस्याएं आएंगी।