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pankajgupta029
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जयपुर के राजामान सिंह अपने समय के बड़े नामी योद्धा थे। अकबर के दरबार में उनका सम्मान था। एस समय की बात है कि वे अपने कुछ सिपाहियों के साथ कहीं से लौट रहे थे। रास्ते में चित्तौड़ पड़ा और उनको राणा प्रताप की याद आई। वे राण प्रताप से मिलने उनके महल तक आ गए। राणा प्रताप ने मानसिंह का आदर सत्कार तो खूब किया पर भोजन के समय उनके साथ खाने पर नहीं बैठे। उन्होंने अपनी जगह पर अपने बेटे को बैठा दिया। मानसिंह का पारा चढ़ गया और वे क्रोधित होकर बोले, यदि मै इस घोर अपमान का बदला न लूँ तो मेरा नाम मानसिंह नहीं।
राणा प्रताप ने शेर के मुँह में हाथ डाल दिया था। अब तो इसका परिणाम उन्हें भुगतान ही था। ठीक एक महीने के भीतर ही राजा मानसिंह मुगल साम्राज्य की चुनी ही सेना लेकर हल्दीघाटी के मैदान में आ धमके। घमासान लड़ाई ठन गई। चारों ओर हाहाकार मच गया और खून की धारा बह चली। लोशों पर लाशे बिछ गईं। मुगलों की अपार सेना के सामने राणा की सेना ठहर नहीं पाई। प्राण प्यार चेतक भी सदा के लिए बिछुड गया। हजारों वीर राजपूत सदा सदा के लिए इस धराधाम से उठ गए।
राणा प्रताप को भागकर अरावली पर्वत की गुफाओं में शरण लेनी पड़ी। वे परिवार के साथ कभी इधर तो कभी उधर ठोकरें खाते-फिरते थे। एक दिन खाना मिलता, दूसरे दूसरे दिन पानी से ही काम चलाना पड़ता था। एक बार तीन दिनों तक निराहार रहने के बाद घास की रोटी बनी। छोटी बच्ची खाने ही वाली थी कि वनबिलाव आया और एक ही झपट्टे में रोटी लेकर आँखों से ओझल हो गया।