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किसी देवता को रिझाने से ज्यादा खुद देवता बन जाना ज्यादा सरल है। देवता संस्कृत के दिव् धातु से बना है जिसका अर्थ प्रकाश है। सूर्य को प्रथम एवं प्रत्यक्ष देवता इसीलिए कहा गया है कि वह प्रकाश के साथ जङ चेतन को ऊर्जा देता है। जब खुद के अलावा किसी अन्य के जीवन मे अंधेरा दिखाई पङे तो उसे आत्मबल की ऊर्जा देकर कोई भी व्यक्ति देवता की श्रेणी मे खङा हो सकता है। मानव जब देवी देवता की पूजा आराधना करता है तो इस बात पर जरूर ध्यान दे कि जिस देवी देवता की पूजा की जा रही है वे क्यो पूजनीय हुए? जिन कार्यों से वे पूजनीय और वंदनीय हुए वही आचरण पूजक को अपने जीवन मे अपना कर पूजनीय व्यक्तित्व बनाने का कार्य करना चाहिए। ऐसा नही कि हम पूजा तो भगवान विष्णु , भगवान शंकर, माँ दुर्गां की करें और आजरण रावण, जालंधर या लंकनी-डंकनी का करे, यह तो और धातक असर डालता है। कोई भी व्यकति छल, धोखा विश्वासघात, शोषण और उत्पीङन मे लगता है तो एक अज्ञात भय उसमे धीरे धीरे समाने लगता है। जबकि सदाचार का जीवन जीने से आत्मबल मजबूत होता है। गोस्वामी तुलसीदास ने धीरज, धर्म, मित्र अरू नारी, आपदकल परिखहौं चारि चौपाई मे माध्यम से यह संदेश दिया है कि जिदंगी मे विपरीत स्थति या अंधकार उक्त गुणों एवं मनुष्य की मन स्थितियो की परीक्षा लेते है। इस हालत मे सबसे पहले धैर्य बनाए रखना चाहिए। इसी के साथ सत्य एवं सदाचार को मजबूती से धारण रखना चाहिए । यदि इन सद्गुण को छोङकर आनन फानन मे बिना सोचे समझे कोई नकारात्मक कदम उठा लेने पर उसके गंभीर परिणाम ही होगें। फिर तो उसे छुपाने के लिए झूठ फरेब का आवरण ओढना पङता है जो मनुष्य को देवता नही दैत्य की श्रेणी मे ले जाता है। मन मे ग्लानि भी होने लगती है, लेकिन बाह्य स्तर पर आदर्श की बात करनी पङती है। जीवन मे द्वंद उत्पन्न होता है। जो सर्वाधिक कष्टदायी स्थति होति है। घर पर या समाज मे साहस के साथ खङे होने मे हिचक होती है। व्यक्ति खुद के हालात मे इतना उलझ जाता है कि वह दूसरो की मदद की स्थति मे नही होता है।