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AxarJi
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यह 1997 की बात है जब मेरी मां कैसर के चौथे पड़ाव पर पहुचकर जिदगी को अलविदा कह गई थीं। वह प्रथम श्रेणी की सरकारी अधिकारी थी लेकिन देढ़ साल में उनके इलाज में आए खर्च के चलते उनकी मौत के कुछ ही घंटो के भीतर हमारा परवार एक तरह से गरीबी रेखा से नीचे पहुंच गया था। पिछले साल यह बात सामने आई थी कि स्वास्थ्य खर्च के चलते हमारे देश में करीब पांच करोड़ लोग बी.पी.एल श्रेणी में आते है। इस पर आने वाला खर्च वज्रपात से कम नहीं होता जो किसी परिवार को कई वर्ष पीछे धकेल देता है।
शायद यही वजह रही कि प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने 2017 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति यानी एन.एच.पी के बाद 2018 मे राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना यानी एन.एच.पी.एस का आगाज किया। भारत मे हेल्थकेयर सुधारो के इतिहास में ये दो कदम क्रांतिकारी है। भारत जैसे निम्न एवं माध्यम आय वाले देश की जटिल हेल्थकेयर चुनौतियो को देखते हुए यह सटीक समाधान ही कहा जाएगा। एक ओर देश में 50 करोड़ की आबादी के लिए एन.एच.पी.एस की योजना है वही डेढ़ लाख स्वास्थ्य एवं देखभाल केद्र इसमे द्वारपाल की भूमिका निभाएगे। इसके साथ ही सरकार टीका करण कार्यक्रम, किफायती फार्मेसी श्रृंखला के विस्तार राष्ट्रीय परिक्षण कार्यक्रम, राष्ट्रीय पोषण मिशन और तपेदिक यानी टी.बी. से जूझ रहे मरीजो को पोषण और अन्य सुविधाए प्रदान करने को प्रतिबद्ध है।
स्वास्थ्य मंत्रालय एक टोल-फ्री हेल्पलाइन की भी योजना बना रहा है जिसमे लोग कॉल के जरिये सामान्य बीमारियो में दवा एवं अन्य सलाह ले सकते है। इसमे सामान्य मानको के आधार पर ओवर द काउंटर यानी ओ.टी.सी दवाओ के मशवरे का प्रावधान होगा। यदि हम आम सरकारी स्वास्थ्य योजनाए और हालिया आम बजट की कङियों को जोड़ें तो उसका यही मर्म निकलता है कि बीते सात दशको मे यह स्वास्थ्य को समर्पित बजट है और स्वास्थ्य के मोर्चे पर चुनौतियो से निपटने के लिए सरकार के पास व्यापक योजनाएं है।