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shubhamtomar1194359
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हम सब लोग एक भीड़ से गुजर रहे हैं। जो सवेरे घर से निकलकर दफ्तर और वापस घर जाकर अपना दिन सार्थक करते हैं, उन्हें भीड़ से सिर्फ बस में साक्षात्कार होता है। जो मोटर से चलते हैं उनके लिए भीड़ एक अवरोध है जिसे वे लोग सशक्त और फुर्तीली सवारी गाड़ी से पार कर जाते हैं। जो पैदल चलते हैं वे खुत भीड़ हैं। लेकिन ये तीनों वासत्व में न तो भीड़ से कुथ समय के लिए निपट कर बाकी समय मुक्त हैं न अलग-अलग रास्तों के कारण भीड़ के अन्दर कम या ज्यादा फँसे हुए हैं। ये सब बिल्कुल एक ही तरह से और हर समय पूरी तौर से भीड़ में फँस चुके हैं। सिर्फ इतना है कि ये जानते नहीं, और यह तो बिल्कुल नहीं जानते कि जसके पास सत्ता है, वह राज्य की हो या संगठित उद्दोग की, वह भीड़ का इस्तेमाल भीड़ में फँसे प्रत्येक व्यक्ति के विरुद्ध करता है। जान भी लें तो सिर्फ इतना जानते हैं कि हम इस संसार के नहीं रह गए हैं और हमारे चारों तरफ जीवन नहीं बल्कि भीड़ है जो अपनी शक्ल भीड़ के पर्दे पर नहीं देख सकते। अगर किसी को यह शक्ल दिखाई देने लगे तो उसे मालूम होता है कि अब वह जिस भीड़ को पहचानता है वह अभी तक उसके विरुद्ध इस्तेमाल की जाती रही है। अपनी शक्ल का यह परिचय कवि के लिए, जो एक भीड़ से अन्य सामान्य जनों की अपेक्षा अधिक गहरा भाषाई संबंध रखता है, एक मुक्त कर देने वाला अनुभव बन जाता है। इसका विपर्यय भी सही है कि जब तक उसे अपनी शक्ल नहीं दिखाई देती, वह फँसा रहता है।