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shubhamtomar1194359
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परमात्मा निर्बलों को प्राप्त नहीं होता। यह सुनिश्चित तथ्य है कि शक्ति के बदले ही सुख मिलता है। जिस प्रकार पैसे से खरीदे जाने वाले सभी पदार्थ प्राप्त हो जाते हैं उसी प्रकार शक्ति के बदले में विविध प्रकार के आनंद प्राप्त किए जाता है, जिसका शरीर शक्तिशाली है, इद्रियां सयंम है, वह ही विविध प्रकार के इंद्रीय भोगो को भोग सकता है। जिसका शरीर रोगी-निर्बल और अशक्त है, उसको तमाम और उत्तम इंद्रीय भोग भी खराब लगते है। शिक्षा, स्वास्थ्य, धन, संगठन की क्षमता, उनुव और पुरूषार्थ शक्तियों के भंडार है। जिसके पास ये भंडार जितनी अधिक मात्रा में है वह उतनी ही अधिक संपत्ति , वैभव, समृद्धि और ऐश्वर्य सुख सामग्री प्राप्त कर सकता है। जिसके पास इन शक्तियों की जितनी कमी है, वह उतनी ही मात्रा में अभावग्रस्त और कठिनाइयो का जीवन व्यतीत करेगा।
शरीर को सुख देने वाले ऐश्वर्य शरीर से संभंध रखते है। जिसने जितनी अधिक भौतिक योग्यताएं एकत्र कर ली है, वह उतना ही अधिक संसारिक सुख भोग सकता है, पर ध्यान रहे कि वह आत्मिक सुख को उपलब्ध नहीं हो सकता। आत्मिक सुख के लिए आत्मिक शक्तियों की आवश्यकता है। सद्गुण, सात्विक दृष्टिकोण, सात्यनिष्ठ होना, संयम, उदार और नम्र व्यवहार रूपी ये दैव्य शक्तियां जिनके पास है उन्हे सर्वत्र मानसिक सुख व शान्ति उपलब्ध होगी। संसारिक कठिनाइयां उन्हे विचलित नहीं कर सकेंगी। हमारे जीवन में धन उतना ही आवश्यक है जितने से शारीरिक, मानसिक और पारिवारिक उत्तरदायित्व सहूलियत से पूरे होते रहे। इससे अधिक धन-उपर्जन और जोड़ने की तृष्णा सुखदायक नही, बल्कि अनेक काल-क्लेश, पाप और तपों को देने वाली होती है। इसीलिए अनावश्यक धन-संग्रह को पाप माना गया है। परिग्रह को पाच प्रमुख पापों में से एक माना गया है। जोड़ने योग्य , जमा करने योग्य, कोई न संतुष्ट होने योग्य संपत्ति तो सद्गुण रूपी दैवीय संपदा ही है। शिक्षा, शिल्प, संगीत, रसायन-शास्त्र आदि विष्यों से संबंधित योग्यताए सोने भरी एक तिजोरी से अधिक मूल्यवान है। जिनसे गुणो की उपेक्षा करके धन कमाने का ही कार्यक्रम बनाया हुआ है वह आत्मिक दृष्टि से मूर्ख ठहराया जाएगा। धन से योग्यताओ का मूल्य अधिक है।