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arpanshukla
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धर्मंग्रंथो का उद्दघोष है कि सत्य से बड़ा दूसरा कोई धर्म नहीं है। महापुरूषों का भी यही कथन है कि सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने मे सदैव तत्पर रहें। ऐसे करते ही अज्ञान, ज्ञान में बदल जाएगा। जीवन की यात्राअद्भुत होगी। नित्य प्रति उल्लास उमंग उत्साह का समावेश होगा। सत्य व्यक्ति को निर्भीक बना देता है। सकी यात्रा स्वभावतः महाशून्य की तरफ होने लगती है। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि जो व्यक्ति सत्य निष्ठ होता है, अपने कर्तव्य के प्रति सोचत व सजक होता है। उसके मार्ग का कारण बनना इतना सरल नही होता, क्योकि सत्य के साथ तो स्वयं सच्चिदानंद परमात्मा होता है। देखा जाए तो वास्तविकता ही यही है। यदि हमें अपने कर्तव्यों का सही मायने में बोध हो तो वह परमात्मा सदैव किसी न किसी रूप में हमारी सहायता अवश्य ही करता है। जो जीवन को पवित्रता और पारदर्शिता के साथ जीते है, जो निर्मल मन वाले है उन्हें परमपिता परमेश्वर सहज ही स्वीकार करते है। शांति भी उस एक की चरण-शरण में ही है। सत्य को पालेना या जान लेना इतना आसान कार्य भी नहीं है। पूजा-पाठ की अनेक पद्धतियां अपनाकर भी यदि हमारे जीवन में, हमारे आचरण में वह सत्य नहीं उतारा तो सब निरर्थक है।
जो लोग सत्यनिष्ठ होते है, उनमें देवत्व होता है। वे परमात्मा के प्यारे होते है। हालाकि इस राह में कई कठिनाइयां बी आती हैं, लेकिन जो दृढ़ संकल्पित होते है, जो अपने मन की अवाज को पहले सुनते है, वे स्तय असत्य का भेद भली-भाति कर पाते हैं। अपनी सत्यवादिता का परिचय व्यक्ति अपने कर्मक्षेत्र में प्रस्तुत कर सकता है। सत्य को अनुभूत किया जा सकता है, लेकिन उसके लिए हमारा हृदय मंदिर पवित्र हो। हर कर्म पूजा बना लें, परमात्मा को साक्ष्य बनाकर करें। यह मानकर कि वह हमारे हर अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा रखे हुए है। सत्य मात्र परमात्मा है, बाकी सारा संसार नश्वर है। सारे सपने झूठे होते हैं, जब इसका बोध हो जाए तो समझे आप सत्य के करीब हैं।
दर्शनध्यानसंस्पर्शैर्मत्स्यी कूर्मीच पक्षिणी।
शुशु पालायते नित्यं थथा सज्जनसंगतिः।।
साधुभ्यस्ते निवर्तन्ते पुत्रः मित्राणि बांधवाः।
ये च तैः सह गन्तारस्तद्धर्मात्सुकृतं मुलम्।।
संसार कूट वृक्षस्य द्वे फले ह्मृतोपमें।
सुभाषितं च सुस्वादुः संगति सज्जने जने।।