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AKGoyal1456989
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यह मच्छरों के प्रकोप का काल है। गांव-कस्बों से लेकर महानगरों तक अस्पतालों में डेंगू-मलेरिया के मरीज पड़े हैं। बहुत छोटे बजट का इस्तेमाल कर मच्छर नियंत्रण से जिन बीमारियों को रोका जा सकता था, औसतन सालाना बीस लाख लोग इनकी चपेट में आकर इनके इलाज पर अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई के अरबों रुपये लुटाने को अभिशप्त हैं। स्वास्थ्य के मामले में भारत की स्थिति दुनिया में शर्मनाक है। चिकित्सा सेवा के मामले में इसके हालात श्रीलंका, भूटान व बांग्लादेश से भी बदतर हैं। अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य पत्रिका लांसेट की ताजा रिपोर्ट ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में हमारा देश दुनिया के कुल 195 देशों की सूची में 145वें स्थान पर है।
देश के आंचलिक कस्बों की बात तो दूर, राजधानी दिल्ली के एम्स या सफदरजंग जैसे अस्पतालों की भीड़ और आम मरीजों की दुर्गति किसी से छिपी नहीं है। एक तो हम जरूरत के मुताबिक डॉक्टर तैयार नहीं कर पा रहे, दूसरा देश की बड़ी आबादी न तो स्वास्थ्य के बारे में पर्याप्त जागरूक है और न ही उनके पास आकस्मिक बीमारी के हालात में किसी बीमा या अर्थ की व्यवस्था है।
हालांकि सरकार गरीबों के लिए मुफ्त इलाज की कई योजनाएं चलाती है, लेकिन व्यापक अशिक्षा और गैर-जागरूकता के कारण ऐसी योजनाएं माकूल नहीं हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही देश में कोई 8.18 लाख डॉक्टर मौजूद हैं। ऐसे में, यदि आबादी 1.33 अरब मान ली जाए, तो औसतन प्रति हजार व्यक्ति पर एक डॉक्टर का आंकड़ा भी बहुत दूर लगता है। तिस पर मेडिकल की पढ़ाई इतनी मंहगी है कि हर डॉक्टर बनने वाले युवा के सामने सबसे पहले शायद कमाने का रोडमैप ही आता हो, सेवा तो बहुत दूर की बात है।