words per minute

21

RahulVerma1286340


00:00

Speed

र्मियों के दिनो की कहानी शारिक ज़ैक के द्वारा :- चुंगी-दफ्तर खूब रँगा-चुँगा है उसके फाटक पर इंद्रधनुषी आकार के बोर्ड लगे हुए हैं सैयदअली पेंटर ने बड़े सधे हाथ से उन बोर्ड़ों को बनाया है देखते-देखते शहर में बहुत-सी ऐसी दुकानें हो गई हैं, जिन पर साइनबोर्ड लटक गए हैं साइनबोर्ड लगना यानी औकात का बढ़ना बहुत दिन पहले जब दीनानाथ हलवाई की दूकान पर पहला साइनबोर्ड लगा था तो वहाँ दूध पीने वालों की संख्या एकाएक बढ़ गई थी फिर बाढ़ गई, और नए-नए तरीके और बैलबूटे ईजाद किए गए ‘ऊँ' या ‘जयहिन्द' से शुरु करके ‘एक बार अवश्य परीक्षा कीजिए' या ‘मिलावट साबित करने वाले को सौ रुपया नगद इनाम' की मनुहारों या ललकारों पर लिखावट समाप्त होने लगी । चुंगी-दफ्तर का नाम तीन भाषाओं में लिखा है चेयरमैंन साहब बड़े अक्किल के आदमी हैं, उनकी सूझ-बूझ का डंका बजता है, इसलिए हर साइनबोर्ड हिंदी, उर्दू और अंगरेज़ी में लिखा जाता है दूर-दूर के नेता लोग भाषण देने आते हैं, देश-विदेश के लोग आगरे का ताजमहल देखकर पूरब की ओर जाते हुए यहाँ से गुज़रते हैं...उन पर असर पड़ता है, भाई और फिर मौसम की बात - मेले-तमाशे के दिनों में हलवाइयों, जुलाई-अगस्त में किताब-कागज़ वालों, सहालग में कपड़े वालों और खराब मौसम में वैद्य-हकीमों के साइनबोर्डों पर नया रोगन चढ़ता है शुद्ध देसी घी वाले सबसे अच्छे, जो छप्परों के भीतर दीवार पर गेरू या हिरमिजी से लिखकर काम चला लेते हैं इसके बगैर काम नहीं चलता अहमियत बताते हुए वैद्यजी ने कहा- "बगैर पोस्टर चिपकाए सिनेमा वालों का भी काम नहीं चलता बड़े-बड़े शहरों में जाइए, मिट्टी का तेल बेचने वाले की दुकान पर साइनबोट मिल जाएगा। बड़ी ज़रूरी चीज़ है। बाल-बच्चों के नाम तक साइनबोट हैं, नहीं तो नाम रखने की जरूरत क्या है ? साइनबोट लगाके सुखदेव बाबू कंपौंडर से डॉक्टर हो गए, बेग लेके चलने लगे।" पास बैठे रामचरन ने एक और नए चमत्कार की खबर दी-- उन्होंने बुधईवाला इक्का-घोड़ा खरीद लिया -- हाँकेगा कौन ? -टीन की कुर्सी पर प्राणायाम की मुद्रा में बैठे पंडित ने पूछा। -- ये सब जेब कतरने का तरीका है --वैद्यजी का ध्यान इक्के की तरफ अधिक था-- मरीज़ से किराया वसूल करेंगे। सईस को बख्शीश दिलाएंगे, बड़ शहरों के डॉक्टरों की तरह इसी से पेशे की बदनामी होती है पूछो, मरीज़ का इलाज करना है कि रोब-दाब दिखाना है। अंगरेज़ी आले लगातार मरीज़ की आधी जान पहले सुखा डालते हैं। आयुर्वेदी नब्ज़ देखना तो दूर, चेहरा देख के रोग बता दे ! इक्का-घोड़ा इसमें क्या करेगा ? थोड़े दिन बाद देखना, उनका सईस कंपौंडर हो जाएगा --कहते-कहते वैद्यजी बड़ी घिसी हुई हँसी में हँस पड़े फिर बोले-- कौन क्या कहे भाई ? डॉक्टरी तो तमाशा बन गई है वकील मुख्तार के लड़के डॉक्टर होने लगे ! खून और संस्कार से बात बनती है हाथ में जस आता है, वैद्य का बेटा वैद्य होता है आधी विद्या लड़कपन में जड़ी-बुटियाँ कूटते-पीसते जाती है तोला, माशा, रत्ती का ऐसा अंदाज़ हो जाता है कि औषधि अशुद्ध हो ही नहीं सकती है औषधि का चमत्कार उसके बनाने की विधि में है धन्वंतरि" वैद्यजी आगे कहने जा ही रहे थे कि एक आदमी को दुकान की ओर आते देख चुप हो गए, और बैठे हुए लोगों की ओर कुछ इस तरह देखने-गुनने लगे कि यह गप्प लड़ाने वाले फालतू आदमी होकर उनके रोगी हों । आदमी के दुकान पर चढ़ते ही वैद्यजी ने भाँप लिया कुंठित होकर उन्होंने उसे देखा और उदासीन हो गए लेकिन दुनिया-दिखावा भी कुछ होता है हो सकता है, कल यही आदमी बीमार पड़ जाए या इसके घर में किसी को रोग घेर ले इसलिए अपना व्यवहार और पेशे की गरिमा चौकस रहना चाहिए
words per minute
0
wpm
accuracy
0%
Text Practice - Time 2471 - English

words per minute