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UMESHKUMAR1180108
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जीवन की अवधि के हिसाब से देखे, तो ज्यादातर युवाओं को अठारह वर्ष की आयु में यह भी समझ नहीं आता है कि उन्हें जीवन को किस दिशा में लेकर जाना है। लेकिन संत ज्ञानेश्वर ने अठारह वर्ष की आयु में समाधि ले ली। उन्होंने सात सौ श्लोकों की गीता पर नै हजार से अधिक छंदों में टीका लिखा। उनकी टीका को योग के अप्रतिम उपदेश गीता की अद्वितीय व्याख्या माना गया है। गीता के छठे अध्याय में श्रीकृष्ण ने जिस आसान-सी ध्यान विधि का उपदेश दिया है, उसकी विवेचना में योग की जिन बारीकियों का उल्लेख किया है, उसे अनुभवसिद्ध योगी ही बता सकता है। संत ज्ञानेश्वर ने अठारह वर्ष की आयु में अपने जीवन को सिद्धि किया और लोकजीवन से विरक्त हो गए। संत ज्ञानेश्वर का जीवन हमें यह बताता है कि हमारे जीवन की सिद्धि के लिए सबसे जरूरी चीज ज्ञान है। ज्ञान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ज्ञान हमारे व्यावहार का मूल है और हमारा व्यवहार अंततः हमारे जीवन का नियति तय करता है। अपने व्यवहार को हमें संप्रदाय निरपेक्ष रख ज्ञान, विचार और विवेक से जोड़कर शुद्ध और मर्यादित रखने की जरूरत है। जब-तक स्वंय के जीवन को भली-भांति नहीं संभाल सकते इस बात की अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि हम दूसरों के जीवन के बारे में कुछ कहें या उन्हें जीवन तय करने के ढंग सिखांए। जबकि यह आम आदत बन चुकी है कि हमें खुद को नहीं संभालना बस दुनिया को बदलना है। हम अपने तरीके से दुनिया बदलना चाहते हैं और जो भी हमारे तरीकों में रूकावट पैदा करता है, हम उसे अपने तरीके समझाने के प्रयास करने की बजाय उसके प्रति दुर्भाव पालने लगते हैं, उसमें कमियां खोजते हैं और उसे हर बात के लिए दोषी साबित करने के षड्यंत्र रचने पर उतर आते हैं। बदलाव को अपने अंदर नही ला पाना ही पाप का मूल कारण है। अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य का ज्ञान होने के बाद यह जानना भी जरूरी है कि जो हम अपने साथ या अपने लिए पसंद नहीं करते वैसा व्यवहार दूसरों के लिए भी न करें। इन सबके अलावा कई बार ऐसा होता है कि जब हम अपनी समझ से सबकुछ ठीक कर रहे होते हैं, लेकिन नतीजे अपेक्षाओं के मुताबिक नहीं मिलते तो हम भगवान तक को कोसने लग जाते हैं कि भागवान भी हमारी नहीं सुन रहे। जब कभी यह ले कि भगवान अनुदार हैं, तो हमें सुदामा को याद करना चाहिए। सुदामा के दृष्टांत हमें बताते हैं कि अकिंचन हम है, भगवान नहीं। कई बार यह वैचारिक संकट भी हमें परेशान करता है कि पहले क्या करें, पहले ईश्वर की सेवा करें या अपनी जरूरतें पूरी करें। इस विचार की अटपटा है। जब हम ईश्वर की सेवा करेंगे तो हमारी जरूरतें तो स्वतः पूरी होंगी। यदि ऐसा नहीं होता है, तो ईश्वर की अकिंचन ठहराने से पहले यह जरूर देख लें कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हम ईश्वर को और ईश्वर की सेवा के दर्शन को समझने में कहीं भूल तो नहीं कर रहे। संसार क्या है विकास क्या है परिवार क्या है