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SatendraSingh2


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्षपणक नाम का एक खरगोश था। उसके कई मित्र थे। कुछ हितैषी उसे समझाते थे कि किसी का भरोसा मत करो। अपनी ताकत बनाओ। पर वह उपेक्षा की हंसी हंस देता और अपने दोस्तों से यारी दोस्ती निभाता। एक दिन कुछ शिकारी कुत्ते उसके पीछे पड़ गए। वह दौड़ता हुआ गाय के पास पहुंचा और कहा, आप मेरी मित्र हैं। शिकारी कुत्ते पीछे पड़ा गए हैं। गाय ने कहा, तो मैं क्या करूं? खरगोश ने कहा, कृपा कर अपने पैने सीगों से इन कुत्तों को मार भगाओं। गाय नेककहा, मेरा घर जाने का समय हो गया। बच्चे इंतजार कर रहे होंगे। अब मैं ठहर नहीं सकती। क्षपणक घोडे के पास पहुंचा और कहने लगा, मित्र, मुझे अपनी पीठ कर बिठाकर इन कुत्तों से बचा लो। घोडे ने कहा, मैं बैठना भूल गया हूं, तुम मेरी ऊंची पीठ पर कैसे चढ़ पाओगे? खरगोश समझ गया कि अश्वराज उसे टरका रहा है। वह अब गधे के पास पहुंचा और बोला, मैं मुसीबत हूं, तुम दुलत्ती मारकर इन कुत्तों को भगा दो। गधे ने कहा, घर पहुँचने में देर हो जाने पर मेरा मालिक मुझे मारेगा। अभी मैं घर जा रहा हूं। यह काम फुरसत के वक्त करा लेना। फिर क्षपणक बकरी के पास पहुंचा और उससे भी उसने वही प्रार्थना की बकरी ने कहा, जल्दी भाग यहां से, कि दूसरों का आसरा तकने से नहीं, आअपने बल-बूते से ही अपनी मुसीबत पार होती है। तब वह पूरी तेजी से दौड़ा और एक घनी झाड़ी में छिपकर अपने प्राण बचा लिए।
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