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PradeepMaurya1167570
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पुराने समय की बात है। तब उड़ीसा में राजा नरसिंह देव का शासन था। वे सूर्य देव के उपासक थे। एक दिन उनके मन में सूर्यदेव का एक भव्य मंदिर बनाने की इच्छा पैदा हुई। उन्होंने अपनी इस इच्छा को समुन्द्र तट पर एक उपयुक्त जगह का चयन कर अंजाम देने की भी तत्काल फैसला कर लिया। मंदिर निर्माण का कार्य शुरू हुआ सैकड़ों मजदूरों और कारीगरों को इस निर्माण से जोड़ दिया गया।
मंदिर निर्माण का कार्य बारह सालों तक चलता रहा, निर्माण में जुटे कारीगरों के सरदार थे, बिशू महाराज जब मंदिर निर्माण के लिए अपने गांव से आया था, तब उसकी स्त्री गर्भवती थी। जब मंदिर निर्माण का काम पूरा होने को आया तब बिशू का पुत्र बारह साल का हो चुका था। धर्मा बचपन से ही सबसे यही सुनता आ रहा था कि उसके पिता समुन्द्र तट पर एक मंदिर निर्माण के लिए हुए हैं। यह सब सुनते सुनते उसे अपने पिता से मिलने की इच्छा हुई। उसने इस बारे में अपनी मां से बात की और पिता के पास जाने की आज्ञा मांगी। मां ने बेटे को खुशी-खुशी आज्ञा दे दी। धर्मा मंदिर की दिशा में चल दिया। उसने चलते समय साथ में एक पोटली में थोड़े से बेर भी रख लिए। जब धर्मा मंदिर निर्माण स्थल पर पहुंचा तो उसने वहां पहले तो आराम करते हुए बेर खाए, फिर अपने पिता की खोज शुरू कर दी। जल्दी ही उसके पिता मिल गए पिता पुत्र को देखकर बहुत खुश हुए। बिशू ने अपने पुत्र को बहुत लाड प्यार दिया।
उधर निर्माण का कार्य लगभग पूरा हो गया था। लेकिन केवल मंदिर का चूड़ा ही नहीं लग रहा था। मजदूर कोशिश करके थक चुके थे। सभी चिंतित थे। दो दिन बात राजा मंदिर के उद्घाटन के लिए आने वाले थे। उद्घाटन के दिन मंदिर में पूजन होना था। राजा ने संदेश भेज दिया था कि अगर दो दिन में मंदिर पूरा नहीं हुआ तो सभी मजदूरों को मृत्यु दंड दिया जाएगा।