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Gauravkumar1409496
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क्या इत्तिफाक है कि साल के आखिरी हफ्ते पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल के बारे में संजय बारू की किताब द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर पर बनी फिल्म को लेकर कांग्रेस के कुछ नेता सवाल उठा रहे हैं, तो साल के बिल्कुल शुरू में पद्मावत को लेकर बीजेपी के नेताओं ने हंगामा किया था। यह शायद कांग्रेस की बदली हुई संस्कृति का असर है कि द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर के विवाद को एक हद से ज्यादा हवा नहीं दी गई। मध्य प्रदेश में इस पर पाबंदी की बात अफवाह साबित हुई। हालांकि पिछले साल मधुर भंडारकर की फिल्म द इंदु सरकार पर कांग्रेस के ऐतराज तीखे थे। बहरहाल, पद्मावत व द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर के बीच ऐसी कई फिल्में रहीं, जिनको तरह-तरह की असहमतियों का सामना करना पड़ा। दिसंबर में ही रिलीज हुई फिल्म केदारनाथ को उत्तराखंड के सिनेमाघरों में दिखाने नहीं दिया गया। यह संदेह अन्यथा नहीं है कि फिल्म का विरोध बस इसलिए किया गया कि वह उत्तराखंड में विकास के नाम पर चल रही पर्यावरण की विनाशलीला की ओर ध्यान खींचती है, वरना फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे उत्तराखंड में किसी सामाजिक-धार्मिक मर्यादा को चोट पहुंचती हो। दरअअसल 2018 में बेसब्री और असहिष्णुता का वह प्याला कुछ और छलकता नजर आया जिसके कुछ छींटे पिछले वर्षों में उड़ते दिखे। सिनेमा, साहित्य और संस्कृति पर इसकी छाया तरह-तरह से पड़ती रहीं। साल के अंत में ही नसीरुद्दीन शाह के वक्तव्य को लेकर जो तीखी प्रतिक्रिया दिखी और जिस तरह अजमेर साहित्य समरोह में उनके कार्यक्रम का विरोध हुआ, वह इसी असहिष्णुता की पुष्टि करता रहा। उनका वक्तव्य सुने बिना उन्हें विदेश जाने की नसीहत दी जाने लगी/ यह अलग बात है कि अजमेर में एक अलग जगह पर उनके कार्यक्रम का आयोजन हुआ और उसी समारोह में लोगों ने हंगामा करने वालों की जमकर खबर भी ली। साहित्य और संस्कृति की दुनिया में यह हड़बड़ाई हुई प्रतिगामी किस्म की हिंसक प्रतिक्रिया मौजूदा समय के राजनीतिक-सामाजिक टकरावों की कोख से निकली है। जिस धार्मिक-सामाजिक मूल्यबोध पर पहले समाज और संस्कृति में बहस होती, उस पर अपने वोटों के हिसाब से राजनीति फैसले कर रही है। इसमें दबंग और आक्रामक बहुसंख्यकवाद हावी दिख रहा है। गोरक्षा से लेकर लव जेहाद और तीन तलाक तक के मामले मूलत: सामाजिक-सांस्कृतिक हैं, लेकिन वे अपने राजनीतिक प्रतिफलन से इस तरह जोड़ दिए गए हैं उन्हें अलग से देखना उन पर बहस करना संभव नहीं रहा।