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ीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को जबरन छुट्टी पर भेजने के आदेश को निरस्‍त करके सुप्रीम कोर्ट ने देश की इस महत्‍वपूर्ण संस्‍था की स्‍वायत्‍तता बहाल की है। यह एक सैद्धांतिक फैसला है, जिसमें लोकतांत्रिक संस्‍थाओं को सक्षम बनाए रखने वालों को बहुत उम्‍मीद और रोशनी की किरण दिखाई दे रही है। व्‍यावहारिक और तकनीकी स्थिति यह है कि सप्रीम कोर्ट ने मामला फिर उसी सेलेक्‍ट कमेटी के पास भेज दिया है, जिसके अध्‍यक्ष स्‍वयं प्रधानमंत्री हैं और उसके दो अन्‍य सदस्‍यों में एक भारत के मुख्‍य न्‍यायाधीश और दूसरे लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं। आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजा जाए या बर्खास्‍त किया जाए इस पर फैसला वही समिति ले सकती है यही सुप्रीम कोर्ट का आदेश है और यही दिल्‍ली पुलिस स्‍पेशल एस्‍टेब्लिशमेंट एक्‍ट 1946 की व्‍याख्‍या है। इसी कानून के तहत देश में सीबीआई का गठन हुआ था। रोचक तथ्‍य यह है कि आलोक वर्मा के भविष्‍य पर यह कमेटी एक हफ्ते में फैसला लेगी और वर्मा को 31 जनवरी तक रिटायर होना है। कहने का मतलब यह है कि यह निर्णय एक सैद्धांतिक निर्णय ही रह जाएगा और इसका सीबीआई और सरकार की दूसरी संस्‍थाओं पर कोई व्‍यावहारिक असर पड़ने वाला नहीं है। आलोक वर्मा दफ्तर जाएंगे लेकिन, कोई नीतिगत निर्णय नहीं ले सकेंगे। हालांकि जिस केंद्रीय सतर्कता आयोग की रिपोर्ट पर आलोक वर्मा को आपत्ति थी वह रिपोर्ट कमेटी के समक्ष रखी जाएगी और उसी से उनके भविष्‍य का निर्णय होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यही कहा है कि सरकार ने आधी रात को जल्‍दबाजी में जो फैसला लिया वह ठीक नहीं था। हालांकि सरकार का कहना था कि सीबीआई के निदेशक और विशेष निदेषक खूंखार बिल्लियों की तरह लड़ रहे थे लिए यह जरूरी हो गया था। अब सुप्रीम कोर्ट का यही कहना है कि लोकतंत्र तो बदले की कार्रवाई से चलता है ही सबक सिखाने की भावना से। वह चलता है कानून के राज से। जो लोग इस बीच यह मानने लगे हैं कि लोकतंत्र किसी एक व्‍यक्ति और किसी एक पार्टी के रुतबे से चलता है वे गलती पर हैं। उन्‍हें इस फैसले से यह सबक मिल गया है कि लोकतंत्र को चलाने के लिए भले ही चुने हुए प्रतिनिधियों के बहुमत का शासन चाहिए और उनका नेता भी चाहिए लेकिन वह चलेगा कानून और संस्‍थाओं की स्‍वायत्‍तता से ही।
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