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JasvirSingh1427007
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पिछले साल लाल किले से अपने भाषण के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के लोगों को एक और संदेश दिया था, इस बार बिना एक भी शब्द बोले। हालांकि प्रधानमंत्री को उस गाड़ी से जाना था, जो सुरक्षा जरूरतों के लिहाज से विशेष रूप से बनी है और सुरक्षा कारणों से ही उस राह पर ट्रेफिक भी रोक दिया जाता है, लेकिन फिर भी उन्होंने तीन सेकेण्ड का समय निकालकर पहले सीट बेल्ट बांधी। यह कहा जा सकता है कि रणनीति के तहत सुरक्षा का संदेश इस तरह से दिया गया था। लेकिन उसके कुछ घंटे बाद ही मैाने देखा कि दिल्ली में लगभग हर उम्र के लोग सीट बेल्ट लगाने के नियम का उल्लंघन कर रहे हैं, गाड़ी की आगे की सीटों पर भी और पीछे सीटों पर भी। सड़क सुरक्षा सभी के लिए अत्यंत महत्व की चीज होनी चाहिए न सिर्फ इसके सामाजिक प्रभाव के कारण, बल्कि इसलिए भी कि भारत में वाहनों की मांग और संख्या लगातार बढ़ रही है। पिछले 30 साल में भारतीय कार बाजार ने लगातार यह दिखाया है कि उसकी संभावनाएं कई विकसित देशों से भी ज्यादा तेजी से बढ़ रही है। मैकेंजी की रिपोर्ट बताती है कि अगले तीन साल में भारत वाहनों का तीसरा सबसे बड़ा बाजार हो जाएगा। और 2040 तक प्रति एक हजार आबादी पर कारों की संख्या नौ गुनी हो जाएगी। पर जब हम सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाने लोगों की बढ़ती संख्या को देखते हैं, तो पता लगता है कि गाडयिों की बढ़ती संख्या के मुताबिक यहां सुरक्षा को लेकर जागरूकता नहीं बढ़ रही। असल में यह संख्या साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। कार बाजार की तेजी का यह सबसे खराब नतीजा है। अगर हम सुरक्षा की संस्कृति विकसित नहीं करेंगे, तो यह संकट बढ़ता ही जाएगा। इसके लिए सभी राज्यों में इस उद्योग के लिए जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत तो है ही, साथ ही इंटरनेट का जो नया रूप सामने आ रहा है, वह भी हमारी काफी मदद कर सकता है। इस समय दुनिया भर की कंपनिया ऐसी कारों को विकसित करने पर काफी निवेश कर रही हैं, जो आपस में एक-दूसरे के संपर्क में होंगी। तरह-तरह के सेंसर ड्राइवर को यह बता देंगे कि सड़क पर उसके अलावा और कौन है?