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योध्या के भूपति श्री दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्री रामचन्द्र जी ने रावण से घमासान युद्ध में उसके नाभि में अमृत होने की बात ज्ञात हो जाने पर झटपट रथ पर चढ़कर अपने प्रचण्ड बाणों का उसकी नाभि पर ऐसा प्रहार किया जिससे कुछ ही क्षणों में उसके प्राण पखेरू हो गये। ऋषियों का मानना है कि ऐसा विद्यावान व्यक्ति अर्थात रावण की जैसी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता। अतः मनुष्य को कभी घमण्ड नहीं करना चाहिए।
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