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SunilGour
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भारत में हमारे सामने बड़ी चुनौतियां है। अपनी उत्पादकता में अच्छी-खासी वृद्धि से लेकर जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने तक शुष्क भूमि पर खेती संभालने से लेकर गरीबी और कुपोषण के तेजी से उन्मूलन तक काफी कुछ इन चुनौतियों में शामिल है। कहते हैं कि आप वही करते रहें, जो आपने अतीत में किया तो आपको वही नतीजे मिलेंगे, जो हमेशा मिलते आए हैं। और हम ऐसा नहीं चाहते। इसका मतलब है कि हमें कुछ अलग ढंग से काम करना होगा। इसका मतलब है कि हमें नवाचार अपनाना होगा।
भारत को विशेष तौर पर 'नवाचार पर आधारित कृषि वृद्धि की ओर तेजी से बढ़ने की जरूरत है। इसे तेज गति से व्यापक-स्तर पर और टिकाऊ तरीके से पाना होगा। हमें अपनी प्रतिष्ठित 'भारतीय कृषि अनुसंधान प्रणाली से फायदा मिला है। लेकिन हमें यह समझना होगा कि कोई भी राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली गतिविधियों पर आधारित होती है। कृषि विज्ञान एवं जानकारी प्रणालियां उत्पादन आधारित होती है। इसका अर्थ है कि अतीत के तरीकों की बजाय हम अलग तरीके से काम करना होगा। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान की पुरानी प्रणाली में प्रौद्यागिकी हस्तातंरण पर जोर दिया जाता था। नई राष्ट्रीय कृषि नवाचार प्रणाली में हमें उत्पादन, विपणन, नीतगत अनुसंधान और उद्यम के क्षेत्रों में प्रौद्योगिकीगत एवं संस्थागत नवाचार को अपनाते हुए संपूर्ण नवाचार की ओर बढ़ना होगा। सामूहिक बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल कर हमें प्रौद्योगिकी के हस्तातंरण से सीखने की ओर बढ़ना होगा। अब किसान की भूमिका सीखने, अपनाने और मानने तक सीमित नहीं रहेगी। उन्हें ज्ञान, प्रक्रिया और नवाचार का सह-निर्माता बनना होगा। हमें 'अनुसंधान एवं अनुसंधान संबंधी बुनियादी ढांचे की वित्तीय देने की बजाय संपूर्ण नवाचार के लिए संस्थागत क्षमता मजबूत करने की ओर बढ़ना चाहिए, जिसके साथ नवाचार को प्रोत्साहन देने वाला अनुकूल नीतिगत माहौल भी हो। क्या उद्योग तथा विनिर्माण और कृषि में नवाचार से विशेषकर अभी सामने आ रहे नए उदाहरणों से कोई सबक सीखना संभव है उत्तर है हां इस आलेख के लेखक और दिवंगत प्रख्यात विचारक सी.के. प्रहलाद ने हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू के जुलाई-अगस्त 2010 के अंक में 'इनोवंश हॉली ग्रेल शीर्षक से एक लेख लिखा था। लेख में बताया गया था कि किस प्रकार किल्ल्त और आकांक्षा ने मिलकर भारत को अपने अनुकूल नवाचार विकसित करने में मदद की है।