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Gauravkumar1409496
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प्रेमचन्द्रः- रामलीला- इधर एक मुद्दत से रामलीला देखने नहीं गये। बंदरों के भद्दे चेहरे लगाये, आधी टाँगों का पाजामा और काले रंग का ऊँचा कुरता पहने आदमियों को दौड़ते, हू-हू करते देख कर अब हँसी आती है; मजा नहीं आता। काशी की लीला जगद्-विख्यात है। सुना है, लोग दूर-दूर से देखने आते हैं। मै भी बड़े शौक से गया; पर मुझे तो वहाँ की लीला और किसी बज्र देहात की लीला मे कोई अंतर न दिखायी दिया। हाँ, रामनगर की लीला में कुछ साज-सामान अच्छे हैं। राक्षसों और बंदरों को चेहरों के चेहरे पीतल के हैं, गदाएँ भी पीतल की हैं; नवासी भ्राताओं के मुकुट सच्चे काम के हाॅ; फिर भी लाखों आदमियों की भीड़ लगी रहती है!
किसी जमाने में हम दोपहर ही से वहाँ जा बैठता, और जिस उत्साह से दौड़-दौड़ कर छोटे-मोटे काम करता, उस उत्साह से तो आज पेंशन लेने भी नहीं जाता। हरे रंग की बुदकियाँ सारा माथा, भौहें, शृगांर होता था। रांमचन्द्र जी के पीछे उल्लास, गर्व, रोमांच होता था। विभिन्न रंग की प्यालियों मे व्यवस्थापक जी ग्रहण करते थे। बाल-विह्नलता & निषाद-लीला देखने में स्वर्ग कि अनुभुति प्रतित होता था।