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sourav0007
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बकि सच यह है कि प्रेम की अतिशयता कमजोर बनाती है और यह भी कि प्रेम एक बड़ी ताकत भी है तो एक बड़ी कमजोरी भी। ताकत है तो ठीक लेकिन जिस दिन प्रेम कमजोरी बन जाय वह भला स्वयं के लिये समाज और राष्ट्र के लिये कितना जायज हो सकता है यह सोचने का विषय है। प्रेम का शाब्दिक अर्थ है कि प्रीति, माया या मोह। यदपि मोह युद्ध से विरत भी करता है और युद्ध के लिये उकसाता भी है। इसी कारण युद्ध में पल-पल त्याग और ग्रहण करने का द्वंद भी चलता रहता है। मेरा मानना है कि यदि युद्ध और प्रेम का कारण भावनाओं का उथल पुथल होना है तो इसमें सब कुछ जायज नहीं हो सकता। भावनाएं हृदय का विषय है और बुद्धि मस्तिष्क का। यदि हृदय और बुद्धि का संतुलन नहीं है तो किसी भी विषय की सफलता संदिग्ध होती है। क्योंकि विवेकहीन बल आतंकवादी को जन्म देता है योद्धा को नहीं और सिर्फ भावनाओं में बहकर प्रेम प्राप्त करने का अर्थ है प्रेम की संकीर्णता।
आज की उपभोक्तावादी संस्कृति ने मानव शरीर को वस्तु के रूप में ढाल दिया है बाजारू बना दिया है। दूसरे मनुष्यों के साथ संबंधों को स्थापित करने की कला को खत्म कर दिया है। उनके भावों को गढ़ना, पढ़ना, शरीर के अंगों में छिपे भावों को खोजना इन सबके लिये उनके पास अब समय भी नहीं है और तकनीक भी नहीं। उन्हें सब कुछ फटाफट चाहिये। प्रेम का इजहार और इंकार सब कुछ उतने ही समय में चाहिये जितने में सामान खरीदा और बेचा जाता है। यह वहीं दौर है जहाँ जेहाद और धर्म की रक्षा के नाम पर निर्दोष मासूमों की हत्या की जाती है और उसे युद्ध का नाम दिया जाता है। आज के तथाकथित ढेर सारे घोषित आतंकवादी संगठनों की युद्ध या नक्सवादी युद्धों की मंशा कितनी जायज है इसे अब तक इन संगठनों द्वारा अंजाम दिये गये विभिन्न घटनाओं के संदर्भ में समझा जा सकता है। ऐसे में इस विषय का जन्म लेना स्वाभाविक है कि क्या प्रेम और जंग में सब कुछ जायज है।