words per minute
11
prachishrivastava
00:00
Speed
विश्व एड्स दिवस हर वर्ष 1 दिसम्बर को बनाया जाता है। एड्स एक जानलेवा बीमारी है जो धीरे-धीरे समूचे विश्व को अपनी गिरफ्त में लेती जा रही है। दुनियाभर के चिकित्सक व वैज्ञानिक वर्षों से इसकी रोकथाम के लिए औषधि की खोज में लगे हैं परंतु अभी तक उन्हें सफलता नहीं मिल सकी है। पूरे विश्व में एड्स को लेकर तरह-तरह की चर्चाएँ हैं। सभी बेसब्री से उन दिन की प्रतीक्षा कर रहे हैं जब वैज्ञानिक इसकी औषधि की खोज में सफल हो सकेंगे। एड्स का पूरा नाम 'ऐक्वायर्ड इम्यूनो डफिशिएंसी सिन्ड्रोम ' है। वैज्ञानिक सन् 1977 ई. में ही इसके प्रति सचेत हो गए थे जब विश्व भर के 200 से भी अधिक वैज्ञानिकों का एक सम्मेलन अमेरिका में हुआ था। परंतु वास्तविक रूप में इसे मान्यता सन् 1988 में मिली। तभी से 1 दिसंबर को हम 'एड्स विरोधी दिवस' के रूप में जानते हैं। वे सभी व्यक्ति जो एड्स से ग्रसित हैं उनमें एच.आई.वी. वायरस अर्थात् विषाणु पाए जाते हैं। आज विश्वभर में एड्स से प्रभावित लोगों की संख्या चार करोड़ से भी ऊपर पहुंच गई है। अकेले दक्षिण व दक्षिण-पूर्व एशिया में ही लगभग एक करोड़ लोग एच. आई. वी. से संक्रमित हैं। अकेले थाईलैंड में ही हर वर्ष लगभग 3 से 4 हजार लोग एड्स के कारण काल का ग्रास बन रहे हैं। अधिक गहन अवलोकन करें तो हम पाते हैं कि विश्व भर में प्रति मिनट लगभग 25 लोग एड्स के कारण मरते हैं। भारत में भी यह रोग अपने पैर जमा चुका है। हम सब की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि हम पूरी सावधानी बरतें तथा इसके प्रति सभी को जागरूक बनाने का प्रयास करें। भारत सरकार भी इसे काफी प्रमुखता दे रही है। दूरदर्शन, समाचार-पत्रों तथा अन्य संचार माध्यमों के द्वारा एक साथ अभियान छेड़ा गया है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसके बारे में सही जानकारी प्राप्त कर सकें। जगह-जगह एड्स सलाहकार केंद्र स्थापित किए गए हैं जहाँ से लोग अपने प्रश्नों का उत्तर प्राप्त कर सकते हैं। अस्पतालों में केवल 'डिस्पोजेबल सुई' का प्रयोग किया जा रहा है। एड्स का फैलाव चूँकि मुख्य रूप से महानगरीय संस्कृति के कारण अधिक हो रहा है, अत: महानगरों में स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है। देह-व्यापार के केंद्रों पर जाकर काम करना,वहाँ चेतना फैलाना हमारे समाज के उत्थान के लिए तथा इस रोग के बचाव के लिए अपरिहार्य बन गया है। आशा है कि शीघ्र ही वैज्ञानिक इस जानलेवा बीमारी का निदान ढूँढ लेंगे जिससे जल्द ही विश्व को एड्स मुक्त किया जा सकेगा। हाल ही में भारत की कुछ कंपनियों ने एड्स की कुछ ऐसी दवाइयाँ विकसित की हैं जिनसे रोगियों की पीड़ा काफी कम हो सकती है।