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ShishirMalviya


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ाजा कृष्‍णदेव राय के मन में तेनालीराम के लिए बहुत स्‍नेह और सम्‍मान था। तेनालीराम के कारण दरबार में किसी की एक चल पाती थी। राजगुरु जिसे तेनालीराम कई बार छका चुका था, वह सदा इस ताक में रहता था कि किसी तरह तनालीराम से अपने अपमान का बदला ले। आखिर राजगुरु को एक उपाय सूझ ही गया। उसने महारानी के निकम्‍मे और मूर्ख भाई को भड़काया कि तेनालीराम बेकार ही राजा की निगाह में इतना चढ़ा हुआ है। उसमें योग्‍यता है, कोई और गुण। तेनालीराम के पद पर तो आपको होना चाहिए। रानी का भाई मूर्ख तो था ही। वह राजगुरु की बातों में गया और अपनी बात मनवाने सीधा बहन के पास पहुँचा। रानी ने उसे काफी देर तक तेनालीराम की योग्‍यता के बारे में बताया, लेकिन अपने भाई की जिद के आगे रानी को झुकना पडा। शाम को राजा के महल में आने पर रानी ने तेनाली को हटाकर अपने भाई को रखने वाली कही! राजा ने रानी को तेनाली की विद्वता सम्‍बन्‍धी बहुत सारी बातें बताई। रानी अपनी बात बनते देखकर आँखों मे आँसू लाकर बोली- आप मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकते कि तेनालीराम को निकालकर उसके पद पर मेरे योग्‍य भाई को नियुक्ति कर दें। राजा, रानी के भाई की मूर्खता से अच्‍छी तरह परिचित थे, लेकिन रानी को मनाना भी आवश्‍यक था। कुछ देर सोचने के बाद उन्‍होंने रानी से कहा- इस तरह तेनालीराम को अगर निकाल दिया गया तो प्रजा मे बड़ा असंतोष फैल जाएगा। उसे निकालने के लिए पहले यह साबित करना होगा कि वह अपराधी है। रानी के उपाय बताया- आप मुझसे रुष्‍ट होने का नाटक कर यहाँ से चले जाइये और तेनालीराम से कहिए कि रानी को हमारे पास लेकर आओ। अगर ऐसा कर सके तो अपने पद से हटा दिये जाओगे। मैं उसके साथ आऊँगाी ही नही और आपको तेनालीराम को हटाने का बहाना मिल जाएगा। राजा ने रानी की बात मान ली। दूसरे दिन राजा के रूष्‍ट होने का समाचार चारों ओर फैल गया। तेनालीराम जब राजा से मिलने गये तो उन्‍होंने वही बात उससे कहीं, जो रानी ने सुनाई थी। तेनालीराम का माथा ठनका। उसे लगा कि अवश्‍य कोई गड़बड़ है। उसने अपने एक आदमी को कुछ समझाया और फिर रानी से मिलने महल में जा पहुँचा। वहाँ वह अभी रानी का कुशल समाचार पूछ ही रहा था कि उसका।
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