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ShishirMalviya
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भारत में चीन के राजदूत ल्यो झाओशी इन दिनों भूटान की यात्रा पर हैं। उनके साथ ही एक सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल भी गया है जो भूटान में चीन के बसंतोत्सव कार्यक्रमों में भाग लेगा। इसे लेकर नई दिल्ली के कान खडे हो गए हैं। भूटान चीन का ऐसा पड़ोसी देश है, जिसका चीन से किसी भी तरह का राजनयिक संबंध नहीं है। यह जरूर है कि समय-समय पर दोनों देशों के नेता एक-दूसरे के यहां आते-जाते रहे हैं लेकिन बात इससे आगे कभी नहीं बढ़ी चीन की नजरें पिछले कुछ समय से हिमालय के इस छोटे से शांत देश पर हैं। चीन जिस तरह से भारत को घेरेने की कोशिश कर रहा है, उसके लिए यह जरूरी है कि वह किसी तरह भूटान को अपने खेमे में खींच लाए। डेढ़ साल पहले चीन ने डोका ला दर्रे पर जिस तरह अपनी सेना को तैनात किया था उससे भी यह मंशा साफ हो गई थी। तब भारत की आक्रामकता के कारण चीन अपने इरादे में सफल नहीं हो सका, लेकिन अब खबर यह है कि वह दूसरे तरीके आजमा रहा है। चीन यह चाहता था कि भूटान उसके बेल्ट एण्ड रोड इनिशिएटिव कार्यक्रम में शामिल हो, हालांकि भारत की तरह ही भूटान भी इसमें शामिल नहीं हुआ। अब चीन भूटान को कई तरह के आर्थिक प्रलोभन दे रहा है। अभी तक भूटान से भारत को कोई दिक्कत नहीं आई है लेकिन पिछले साल चुनाव के बाद यहां बनी नई सरकार जो संकेत दे रही है, उससे स्थितियां बदलने लग गई हैं। वैसे तो भूटान में संविधानिक राजतंत्र है, लेकिन प्रशासनिक कामकाज वहां की चुनी हुई सरकार चलाती है। पिछले साल हुए आम चुनाव के बाद वहां जब से लोटे शेरिंग ने प्रधानमंत्री का पद संभाला है, उन्होंने चीन की तरफ जाने के कई संकेत दिए हैं। यही वजह है कि उसके बाद से चीन के विदेश उपमंत्री कांग ज्यूआनवू ने भी थिंपू की यात्रा की थी। भूटान सरकार जल विद्युत पर अपनी निर्भरता कम करना चाहती है।