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RakeshSharma3521


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समय कुरुदेश में ओलों की बड़ी भारी बर्षा हुई। इसके कारण पूरी फसल बरबाद हो गयी। अन्‍न की कमी के कारण भयानक अकाल पड़ गया। चारों तरफ त्राहि-त्राहि मच गयी। आम लोग अन्‍न के अभाव में देश छोड़कर जाने लगे। राज्‍य में उषस्ति नामक ब्राह्मण भी रहते थे जिनकी स्‍त्री का नाम आटिकी था। वे दोनों भी देश छोड़कर इधर-उधर भटकने लगे। अन्‍न के अभाव में दोनों का बुरा हाल था। कई दिन भूखे गुजारने के बाद एक दिन उषस्ति पत्‍नी को पेड़ के नीचे विश्राम करने को कहने के बाद भोजन की तलाश में जुट गये। कुछ ही दूरी पर उन्‍हें एक महावत मिला। महावत उबले हुए उड़द खा रहा था या कहें कि वह बरतन में जीभ से उन्‍हें चाट रहा था। भूख के मारे बेचारे उषस्ति मरणासन्‍न हालात में थे। महावत को खाते देख उनकी भूख और तीव्र हो गयी। उसने रहा नहीं गया। वे महावत के पास गये और उससे कुछ उड़द की याचना की महावत ने कहा कि वह जो उड़द खा रहा है उसके अतिरिक्‍त उसके पास कुछ भी खाने योग्‍य नहीं है। इस पर उषस्ति ने कहा कि वह इनमें से ही उसे कुछ दे दे। महावत ने थोड़े से उड़द उषस्ति का दे दिये। भूख से बेहाल उषस्ति ने कुछ उड़द खा लिये। महावत ने बरतन में बचा हुआ जल भी पीने को दिया। इस पर उषस्ति बोले नहीं, मैं यह जल नहीं पी सकता, क्‍योंकि इसको पीने से मुझे जूठा पीने का दोष लगेगा। महावत को यह सुनकर बड़ा आश्‍चर्य हुआ। उसने पूछा कि ये जूठे उड़द तो आपने बड़े चाव से खाये हैं फिर जल पीने से ही आप पर जूठा पीने का दोष भला कैसे लग जायेगा। उषस्ति ने कहा भाई उड़द देने के लिए मैं आपका आभार व्‍यक्‍त करता हूँ। मैं यदि उड़द खाता तो मेरे प्राण निकल जाते। प्राणों की रक्षा के लिए आपातकालीन धर्म की व्‍यवस्‍थानुसार ही मैं उड़द खा रहा हूं पर जल तो कहीं और भी मिल जाएगा। यदि उड़द की तरह ही मैं तुम्‍हारा जूठा जल भी पी लूं तब तो वह स्‍वेच्‍छाचार हो जाएगा। इसलिए भैया मैं तुम्‍हारा जल नहीं पी पाऊंगा। यों कहकर उषस्ति ने शेष उड़द अपनी पत्‍नी के लिए रख लिए। निकट ही तालाब में जल पीकर वह ब्राह्मणी के पास गये और बचे हुए उड़द उसे खाने को दिए। ब्राह्मणी को पहले ही कुछ खाने को मिल गया था, इ‍सलिए उन उड़दों को उसने खाया नहीं, अपने पास दूसरे दिन के लिए रख लिया।
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