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Shivam_Gupta
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सर्वोच्च न्यायालय के रुख से साफ है कि वह असम में राष्ट्रीय नागरिक पंजिका के समय पर पूरा कराने को लेकर बिल्कुल दृढ़ है। उसने चुनाव ड्यूटी में केंद्रीय सशस्त्र बलों की भूमिका को देखते हुए दो सप्ताह तक राष्ट्रीय नागरिक पंजिका का कार्य रोकने संबंधी गृह मंत्रालय की अपील पर जिस तरह सरकार को डांट लगाई है, उसका इसके अलावा कोई अर्थ हो ही नहीं सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले 24 जानवरी को हुई सुनवाई में ही साफ कर दिया था कि एनआरसी की प्रक्रिया पूरी करने की अंतिम तिथि 31 जुलाई 2018 से आगे नहीं बढ़ाई जाएगी वैसे भी असम में वास्तविक नागरिकों की पहचान का काम वर्षों से राजनीति की भेंट चढ़ा हुआ है।
विदेशी घुसपैठियों को बाहर निकालने के नाम पर सन अस्सी और नब्बे के दशक में आंदोलन हुए, समझौते हुए पर निदान नहीं निकला। असम के मूल निवासियों की शिकायत है कि बांग्लादेश से आए लोगों को हर प्रकार का अधिकार मिल गया है, जिसके कारण उन्हें कठिनाइयां हो रही है। आज उनकी कई पीढ़ी निकल चुकी हे, जिसमें पहचान करना आसान नहीं है। इसलिए जनवरी को भी उसके समक्ष चुनाव का मामला आया था। उसने राज्य सरकार, एनआरसी समन्वयक और निर्वाचन आयोग को यह सुनिश्चित करने को कहा था कि आगामी आम चुनाव से राष्ट्रीय नागरिक पंजी तैयार करने का काम धीमा न पड़े। इसके बावजूद यदि गृह मंत्रालय फिर यही निवेदन लेकर गई तो न्यायालय का उसके खिलाफ टिप्पणी करना स्वाभाविक था। जो सूचनाएं आ रहीं हैं उनके अनुसार अनेक परिवार मूल बाशिंदा होते हुए भी अपने को नागरिक साबित करने के लिए कागजात पेश नहीं कर पा रहे हैं। खासकर अनपढ़ बुजुर्ग लोगों के लिए यह असंभव सा है।
इस कारण पूरे असम में ऐसे लोगों के अंदर यह आशंका है कि पता नहीं उनके साथ क्या होगा। अगर एक बार एनआरसी जारी हो जाए तब भी ऐसे लोगों की पहचान के लिए अवसर रहना चाहिए। उसके तरीके निकाले जा सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी नागरिक पंजिका मसौदा के लिए दावेदारी की ओर से पांच और दस्तावेजों के इस्तेमाल की इजाजत देते हुए कहा था कि गलत व्यक्ति को शामिल करने के बजाए उचित व्यक्ति को बाहर करना बेहतर होगा इस आधार को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।