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kuldeeppal
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यह ठीक नहीं कि तीन तलाक संबंधी विधेयक की तरह से नागरिकता संबंधी विधेयक पर भी पक्ष-विपक्ष के बीच कोई सहमति बनती नहीं दिख रही है। इसका बड़ा कारण विभिन्न दलों की ओर से अपने-अपने राजनीतिक हितों को जरूरत से ज्यादा अहमियत दिया जाना है। चूंकि आम चुनाव करीब आ गए हैैं इसलिए यह स्वाभाविक है कि राजनीतिक दल अपने चुनावी हितों की चिंता करें, लेकिन इस कोशिश में राष्ट्रीय हितों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।नागरिकता संशोधन विधेयक पर विपक्ष की आपत्ति का एक बड़ा आधार यह है कि आखिर इसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई, पारसी समुदाय के लोगों को ही भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान क्यों है और मुस्लिम समुदाय के लोगों को बाहर क्यों रखा गया है? सैद्धांतिक तौर पर यह आपत्ति उचित नजर आती है, लेकिन व्यवहारिक तौर पर देखें तो इसका औचित्य नहीं नजर आता कि अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के बहुसंख्यकों को वैसी ही रियायत दी जाए जैसी इन देशों के अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को देने की व्यवस्था की गई है।सभी को एक समान नजर से देखने की मांग करने वाले विपक्षी दल इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि उक्त तीनों देशों से प्रताड़ित होकर भारत की राह देखने वाले मूलत: वहां के अल्पसंख्यक ही होते हैैं, न कि बहुसंख्यक। वे इस तथ्य को भी ओझल नहीं कर सकते कि बांग्लादेश से होने वाली अवैध घुसपैठ के कारण पश्चिम बंगाल और असम के साथ पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों के तमाम इलाकों का सामाजिक संतुलन किस तरह गड़बड़ा गया है। आदर्शवादी सिद्धांत जमीनी हकीकत से मेल भी खाने चाहिए। यह कोई तर्क नहीं हुआ कि भारत दक्षिण एशिया का बड़ा देश है और उसे उन सभी को शरण देनी चाहिए जो इस देश में बसना चाहता है। भारत का संविधान भारत के लोगों पर लागू होता है, बाहर के नागरिकों पर नहीं और यह तय करना देश विशेष का अधिकार है कि वह किसे शरण दे और किसे नहीं?आखिर विपक्षी दलों के साथ इस विधेयक का विरोध करने वाले अन्य लोग यह क्यों नहीं देख पा रहे हैैं कि बाहरी लोगों की घुसपैठ और खासकर बांग्लादेशियों की अवैध बसाहट से असम की संस्कृति किस तरह खतरे में पड़ गई है। क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जो राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर तैयार हुआ उसका एक बड़ा मकसद असम की मूल संस्कृति को बचाना नहीं है? यह सही है कि असम और पूर्वोत्तर के कुछ अन्य राज्यों में नागरिकता विधेयक का विरोध हो रहा है, लेकिन इसकी वजह वह नहीं है जिसे विपक्षी दल बयान कर रहे हैैं।असम और अन्य राज्यों में इस विधेयक का विरोध तो इस आशंका के चलते हो रहा है कि अगर पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों को उनके यहां बसा दिया गया तो उनकी संस्कृति खत्म हो जाएगी? बेहतर हो कि केंद्र सरकार पूर्वोत्तर के उन लोगों और समूहों की चिंताओं को दूर करे जो नागरिकता विधेयक का विरोध कर रहे हैैं। नि:संदेह उसे विपक्षी दलों से भी व्यापक विचार-विमर्श करना चाहिए ताकि बीच का कोई रास्ता निकल सके। राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया जाए तो ऐसा हो सकता है।