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ManishSrivastav
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अनुशासन से तात्पर्य नैतिक और मानसिक प्रशिक्षण से है ओर इससे चरित्र में आत्मनियन्त्रण करने का ढंग उत्पन्न होता है। जिन नियमों का हम पालन करते हैं वे दूसराें के द्वारा नहीं बनाये जाते हैं। हम उनका पालन करते है क्योंकि हम उनका महत्व जानते हैं। एक अनुशासित मनुष्य आदेशानुसार जीवन व्यतीत करता हैं और सफल भी होता है। यदि जीवन में अनुशासन की कोई व्यवस्था नहीं होगी तो भ्रम और हानि से जीवन भर जायेगा। अनुशासन की कोई व्यवस्था नहीं होगी तो भ्रम और हानि से जीवन भर जायेगा। अनुशासन जीवन में प्रत्येक चरण पर अति आवश्यक होता है। मनुष्य को प्रत्येक कदम पर अनुशासन की आवश्यकता होती है। बिना अनुशासन के समाज के सभी कार्य रुक जायेंगे। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी मनमानी करने लगे तो समाज टूट जायेगा। उन्नति रुक जायेगी और सभ्यता नष्ट हो जायेगी। वास्तव में अनुशासन बहुत गुणवत्तापूर्ण होता है। अनुशासन आदमी के हर एक काम में होता है। अनुशासन की प्रथम पाठशाला हमारा घर होता है। हम वस्तुओं को सही से रखना, अच्छा व्यवहार करना, माता-पिता और बड़ों की आज्ञा का पालन करना घर में ही सीखते हैं। हमें ये चीजें प्यार, स्नेह और दण्ड के द्वारा सिखाती जाती है। जब हम आज्ञा पालन नहीं करते है तो दण्ड भी मिलता है। हमारा अनुशासन का प्रशिक्षण स्कूल, कक्षा तथा खेल के मैदान में भी चलता रहता है और अन्तिम प्रशिक्षण जीवन में तब होता है जब हम प्रत्येक गलत कदम पर कष्ट झेलते हैं और बुद्धिमान बनते हैं। असफलता अनुशासित करने के लिए सबसे अच्छा मार्गदर्शक होता है। अनुशासन भोजन अथवा मकान से भी अधिक महत्वपूर्ण होता है। आदमी प्राण वायु से जीता है लेकिन मानवता केवल अनुशासन से जीती है। अनुशासन भाईचारा, सद्भावना व सहयोग से पूर्ण ऐसे स्वर्ग का निर्माण करता है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपना काम प्रसन्नतापूर्वक कर सके और अच्छी तरह से रह सके।