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AmritpalYadav
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अध्यक्ष महोदय, मैं राष्ट्रपति जी के भाषण पर धन्यवाद के प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूँ। किन्तु बहुत बात ऐसी हैं जो उनके भाषण में नहीं आई हैं। यह बातें आ भी नहीं सकती थीं क्योंकि समय का अत्यन्त अभाव था। इस संबंध में मैं भी बहुत कुछ बातें कहना चाहता हूँ। किन्तु समय का अभाव मेरे पास भी है, इसलिए मैं सबसे पहले मुख्य बातों पर ही अपने विचार प्रकट करना चाहूंगा। सबसे पहली बात जो मैं सदन के सामने रखना चाहता हूँ वह देश की रक्षा से संबंधित है। इससे पहले हमारी पड़ोसी देशों से बड़ी-बड़ी लड़ाईयाँ हो चुकी हैं। इन लड़ाईयों के फलस्वरूप हमारे देश के कई भागों को उन्होंने अपने कब्जे में रखा हुआ है। किन्तु हमारी सरकार ने उन्हें हटाने के लिए कोई प्रयत्न नहीं किए हैं केवल बातें ही बातें चलती हैं। मैं चाहता हूँ कि इस बारे में भी सदन की पूरी स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। दूसरी बात मैं यह कहना चाहता हूँ कि विदेशों के साथ हमारे संबंध ऐसे होने चाहिए जिनसे हमारे ऊपर जब कोई हमला करे तो हम नहीं कह सकें कि कौन हमारा दोस्त है, कौन हमारा मित्र है और किसका भरोसा हम नहीं कर सकते हैं। किन्तु आज तक ऐसा देखा गया है कि जब कभी हमारे देश पर ऐसे संकट की स्थिति आई है तो हमें अपने ही पैरों पर ही खड़ा रहना पड़ा है और कोई भी हमारे साथ नहीं आया है। जिन देशों को हम मित्र कहते हैं उन्होंने कुछ ऐसी व्यवस्था कर रखी है जिससे भय लगता है। ऐसे मित्र देशों के जहाजी बेड़े भी हमने हिन्द महासागर में बढ़ते हुए देखे। पहले भी एक देश हमारा घनिष्ठ मित्र था और उसे हम अपना भाई मानते थे, किन्तु बाद में हुई घटनाओं से ऐसा अनुभव हुआ कि राजनीतिक में किसी भी मित्रता का संबंध स्वार्थी से अलग नहीं हो सकता। इसलिए मेरा अनुरोध है कि सभी लिहाज वाली बातों को छोड़कर हमें अपनी सुरक्षा की व्यवस्था पर पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिए। इसके अतिरिक्त मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि हमें अपनी नीति को बनाये रखना चाहिए तथा छोटे-बड़े सभी देशों के साथ अपने सम्बन्ध मैत्रीपूर्ण रखने चाहिए। कभी-कभी देखा गया है कि इस संबंध में हमारी सरकार बिल्कुल एकतरफा निर्णय ले लेती है जिससे ऐसे देशों के साथ सम्बन्ध कायम रखने में कठिनाई होती है।