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AmritpalYadav
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बहुत समय पहले की बात है। जब अरब देश में अमीर शेख अपने काम करवाने के लिए गुलाम रखते थे। उसी समय एक शेख के पास लुकमान नामक एक गुलाम था। उसकी और सेख की जोड़ी भारत में लोकप्रिय अकबर और बीरबल की तरह थी। बीरबल की तरह ही लुकमान भी बहुत बुद्धिमान और चतुर था। अकबर की तरह उसका शेख भी लुकमान से बहुत सारे सवाल पूछता जिसका लुकमान बहुत ही बुद्धिमानी से जवाब देता। उसके पास हर सवाल का एक जवाब होता था।
एक बार शेख ने एक बकरी देखी तो उसके मन में विचार आया और उसने लुकमान से कहा, लुकमान जाओं और उस बकरी को मार कर उसके शरीर का सबसे श्रेष्ठ अंग लेकर आओ। लुकमान तुरंत गया और जाकर बकरी को मार दिया। उसके बाद उसने बकरी की जीभ काटी और जाकर शेख के आगे रख दी। शेख ने जीभ देखी और फिर से कहा, बहुत बढिया। अब जाओ और एक बकरी को मार कर उसके शरीर का सबसे निकृष्ट अंग लेकर आओ।
लुकमान शेख की आज्ञा का पालन करते हुए फिर से एक बकरी को मारने चला गया। बकरी को मारने के बाद एक बार फिर से वो बकरी की जीभ काट लाया। यह देखकर शेख का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। ये क्या मजाक है एक ही चीज सबसे बढिया और सबसे निकृष्ट कैसे हो सकती है शेख गुस्से में आग बबूला होते हुए लुकमान को बोला। तो लुकमान ने शांत स्वभाव से ही जवाब दिया। क्यों नहीं हो सकता। एक जीभ ही वो अंग है जो अच्छा बोले तो इंसान की जय-जयकार होती है। वाणी मीठी हो तो सबके दिलों पर राज करती है और इससे इन्सान सबके हृदय पर विजय प्राप्त कर सकता है। वहीं यदि वह बुरा बोलने लगे तो इंसान का बुरा वक्त उसके साथ रहने लगता है। उसे कोई पसंद नहीं करता और उसका अंत भी बुरा होता है। लुकमान का यह उत्तर सुनकर एक बार फिर से शेख को वहीं खुशी और संतुष्टि मिली जैसा कि पहले उसके जवाबों से मिलती थी। जिसका अर्थ है कि हमें ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जिससे अपने मन को तो शांति मिले और दूसरों पर भी उससे कोई बुरा प्रभाव न पड़े।